इलेक्ट्रो-होम्योपैथी पर बिना पंजीकरण प्रैक्टिस नहीं, केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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होम्योपैथी की शाखा होने से कानून के दायरे में आती है इलेक्ट्रो-होम्योपैथी

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास वैधानिक नियंत्रण के दायरे में है और बिना आवश्यक योग्यता व पंजीकरण के कोई व्यक्ति इसका अभ्यास नहीं कर सकता। कोर्ट ने सिंगल जज का फैसला पलट दिया।


इलेक्ट्रो-होम्योपैथी प्रैक्टिस पर केरल हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास पूरी तरह नियामक कानूनों के अधीन है और बिना वैधानिक पंजीकरण तथा निर्धारित योग्यता के कोई भी व्यक्ति इस पद्धति से चिकित्सा नहीं कर सकता। कोर्ट ने सिंगल जज के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी पर कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं होने के कारण पुलिस उसके अभ्यास में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति प्रीता ए.के. की खंडपीठ ने यह फैसला ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल की अपील पर सुनाया।

क्या था मामला?

मामले में प्रथम प्रतिवादी ने दावा किया था कि उसके पास उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित ‘काउंसिल ऑफ इलेक्ट्रो होम्योपैथी सिस्टम ऑफ मेडिसिन’ से प्राप्त डिप्लोमा है और वह इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास कर रहा है। उसका आरोप था कि ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल के कहने पर राज्य और पुलिस अधिकारी उसकी प्रैक्टिस में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस हस्तक्षेप से संरक्षण की मांग की थी। सिंगल जज ने पूर्व के फैसले Anil Kumar v. State of Kerala के आधार पर राहत देते हुए कहा था कि जब तक कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं है, तब तक पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

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इस आदेश के खिलाफ ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल ने रिट अपील दायर की।

अदालत के समक्ष प्रमुख सवाल

  • क्या इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1953 और केरल स्टेट मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 2021 के तहत विनियमित है?
  • क्या केवल इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का डिप्लोमा रखने वाला व्यक्ति बिना पंजीकरण के प्रैक्टिस कर सकता है?
  • क्या Anil Kumar का फैसला बाध्यकारी मिसाल (Binding Precedent) है?

‘कानून में प्रतिबंध न होना, पूर्ण स्वतंत्रता नहीं’

खंडपीठ ने कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में अधिकार और स्वतंत्रता पूर्ण (Absolute) नहीं हैं। किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर किसी भी गतिविधि का अधिकार नहीं मिल जाता कि उस पर स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों के साथ दूसरों के प्रति उनके कर्तव्यों और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन आवश्यक है।

पुराना फैसला ‘Per Incuriam’ घोषित

कोर्ट ने Anil Kumar v. State of Kerala के फैसले को Per Incuriam (प्रासंगिक कानूनों पर विचार किए बिना दिया गया निर्णय) माना। अदालत ने कहा कि उस फैसले में चिकित्सा व्यवसाय को नियंत्रित करने वाले वैधानिक प्रावधानों पर विचार नहीं किया गया था।

होम्योपैथी की शाखा होने से कानून के दायरे में आती है इलेक्ट्रो-होम्योपैथी

अदालत ने कहा कि प्रतिवादी की योग्यता स्वयं यह दर्शाती है कि वह होम्योपैथी की एक शाखा में प्रशिक्षित है। इसलिए उसकी प्रैक्टिस चिकित्सा पेशे को नियंत्रित करने वाले कानूनों के अधीन होगी।

कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र सीधे लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए इस पर वैधानिक नियंत्रण आवश्यक है।

अनुच्छेद 19(1)(g) का अधिकार भी पूर्ण नहीं

कोर्ट ने कहा—

“किसी भी पेशे को अपनाने का मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है। यह उन कानूनों के अधीन है, जो पेशेवर योग्यता और आचरण को नियंत्रित करते हैं, ताकि चिकित्सकों के अधिकार और मरीजों के जीवन एवं बेहतर स्वास्थ्य के अधिकार के बीच संतुलन बनाया जा सके।”

बिना पंजीकरण इलेक्ट्रो-होम्योपैथी की प्रैक्टिस नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी, ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1953 और केरल स्टेट मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 2021 के तहत विनियमित है। इसलिए इस क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति को संबंधित कानूनों के अनुसार पंजीकरण और अन्य आवश्यक शर्तों का पालन करना होगा।

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सिंगल जज का फैसला रद्द

अंततः खंडपीठ ने ट्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल की अपील स्वीकार करते हुए सिंगल जज का आदेश निरस्त कर दिया और मूल रिट याचिका खारिज कर दी।

मामला

Travancore Cochin Medical Council v. Rajesh K., W.A. No. 1737 of 2020, निर्णय दिनांक 17 जून 2026


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