कथित अंतरराष्ट्रीय कला एवं प्राचीन मूर्ति तस्कर सुभाष चंद्र कपूर
सुप्रीम कोर्ट ने कथित अंतरराष्ट्रीय कला एवं मूर्ति तस्कर सुभाष चंद्र कपूर को जर्मनी लौटाने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। मामला भारत-जर्मनी प्रत्यर्पण संधि के ‘रूल ऑफ स्पेशियलिटी’ और अमेरिका के प्रत्यर्पण अनुरोध से भी जुड़ा है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कथित अंतरराष्ट्रीय कला एवं प्राचीन मूर्ति तस्कर सुभाष चंद्र कपूर को जर्मनी वापस भेजने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। मद्रास हाईकोर्ट ने कपूर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए कहा था कि जिस मामले में जर्मनी से उनका प्रत्यर्पण हुआ था, उसकी सजा पूरी होने के बाद अन्य कथित अपराधों के संबंध में उनकी हिरासत जारी रखने के लिए जर्मनी की सहमति आवश्यक थी।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के 8 सितंबर के फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह तिरुचिरापल्ली केंद्रीय जेल से कपूर को अपनी हिरासत में लेकर उन्हें जर्मनी वापस भेजने के लिए कानून के अनुसार कदम उठाए।
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक है। इस चरण पर शीर्ष अदालत ने मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
जर्मनी से प्रत्यर्पण के बाद भारत में सजा
सुभाष चंद्र कपूर अमेरिकी नागरिक हैं। उन्हें 13 जुलाई 2012 को जर्मनी से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। यह प्रत्यर्पण तमिलनाडु के उदयारपालयम थाने में दर्ज मूर्ति चोरी के मामले के संबंध में हुआ था। मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 457 और 380 के तहत आरोप लगाए गए थे।
यह मामला तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य क्षेत्रों से मंदिरों की मूर्तियों की चोरी से संबंधित था। कपूर को इस मामले में मुकदमे का सामना करना पड़ा और कुंभकोणम के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 1 नवंबर 2022 को उन्हें दोषी ठहराते हुए 10 साल के कारावास की सजा सुनाई।
मद्रास हाईकोर्ट के अनुसार, पहले से काटी गई अवधि का समायोजन करने के बाद प्रत्यर्पण वाले मामले में उनकी सजा पूरी हो गई थी। हिरासत प्रमाणपत्र में इस दोषसिद्धि के संबंध में रिहाई की तारीख 22 फरवरी 2023 दर्ज थी।
इसके बाद मुख्य सवाल यह उठा कि जिस अपराध के लिए जर्मनी ने कपूर का प्रत्यर्पण किया था, उसकी सजा पूरी होने के बाद क्या भारत में कथित तौर पर पहले किए गए दूसरे अपराधों के संबंध में उनकी हिरासत जारी रखी जा सकती है?
भारत-जर्मनी प्रत्यर्पण संधि का ‘रूल ऑफ स्पेशियलिटी’ क्या है?
मद्रास हाईकोर्ट ने इस विवाद की जांच भारत-जर्मनी प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 19 और प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 की धारा 21 के संदर्भ में की।
‘रूल ऑफ स्पेशियलिटी’ (Rule of Speciality) प्रत्यर्पण कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। सामान्यतः इसके तहत जिस व्यक्ति को किसी विशेष अपराध के लिए दूसरे देश को सौंपा जाता है, उसके खिलाफ प्रत्यर्पण करने वाले देश की सहमति के बिना प्रत्यर्पण से पहले किए गए अन्य अपराधों के संबंध में अभियोजन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, बशर्ते संधि में निर्धारित अपवाद लागू न हों।
मद्रास हाईकोर्ट ने माना कि भारत-जर्मनी संधि का अनुच्छेद 19 केवल दूसरे अपराधों के लिए अभियोजन को सीमित नहीं करता, बल्कि निर्धारित अपवादों के अधीन ऐसे अपराधों के संबंध में हिरासत या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अन्य प्रतिबंधों को भी नियंत्रित करता है।
जर्मनी ने अतिरिक्त अभियोजन की सहमति देने से किया था इनकार
हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी का उल्लेख किया, जिसके अनुसार जर्मनी ने कपूर के खिलाफ अभियोजन का दायरा बढ़ाने के प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी थी। जर्मनी ने बाद में एक अन्य राजनयिक नोट के माध्यम से भी अपना रुख दोहराया।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अक्टूबर 2019 में तमिलनाडु के मुख्य सचिव ने जर्मन अधिकारियों को आश्वासन दिया था कि प्रत्यर्पण की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया जाएगा और कपूर पर केवल अपराध संख्या 65/2008 के संबंध में मुकदमा चलाया जाएगा, जिसके लिए जर्मनी से मंजूरी प्राप्त थी।
राज्य सरकार और मामले में हस्तक्षेप करने वाले पक्षों ने दलील दी थी कि कपूर के खिलाफ अन्य मामले भी कथित मंदिर-मूर्ति चोरी और तस्करी की एक व्यापक साजिश से जुड़े हैं। उन्होंने आरोपों की गंभीरता पर भी जोर दिया।
हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता प्रत्यर्पण संधि के तहत आवश्यक सहमति का विकल्प नहीं हो सकती। अदालत के अनुसार, जर्मनी से सहमति मांगने की प्रक्रिया लंबित होना अपने आप में सहमति नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने हिरासत को बताया था कानून के अधिकार के बिना
मद्रास हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला था कि कपूर की लगातार हिरासत के लिए उस समय प्रभावी कानूनी आधार होना आवश्यक है। भविष्य में सहमति मिलने की संभावना के आधार पर वर्तमान हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत को ‘कानून के अधिकार के बिना’ मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की थी। अदालत ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर कपूर को तिरुचिरापल्ली केंद्रीय जेल से अपनी हिरासत में लेने और उन्हें जर्मनी वापस भेजने के लिए कानून के अनुसार कदम उठाने का निर्देश दिया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है।
अमेरिका के प्रत्यर्पण अनुरोध का भी है मामला
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में यह भी दर्ज था कि अमेरिका ने 27 सितंबर 2021 को कपूर के प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध किया था।
विदेश मंत्रालय की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, यदि कपूर को भारत में घरेलू हिरासत से रिहा किया जाता, तो अमेरिकी प्रत्यर्पण अनुरोध के संबंध में प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 5 के तहत कार्यवाही के लिए उन्हें नई दिल्ली स्थित पटियाला हाउस की विशेष अदालत के समक्ष पेश करना पड़ सकता था।
इस पहलू के कारण मामला केवल भारत-जर्मनी प्रत्यर्पण संधि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अमेरिका के अनुरोध और भारत में उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया से भी जुड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट में किसने दायर की अपील?
सुप्रीम कोर्ट में अपील मंदिरों के भक्त एस. विजय नारायणन ने दायर की थी। उन्होंने कथित रूप से अपवित्र की गई देवमूर्तियों के ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ अथवा संरक्षक के रूप में याचिका दाखिल की।
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.वी. योगेश्वरन तथा अधिवक्ता राम शंकर और नवीन अटम ने पक्ष रखा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाए जाने से कपूर को जर्मनी लौटाने की प्रक्रिया फिलहाल उस आदेश के आधार पर आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। अब शीर्ष अदालत के समक्ष प्रत्यर्पण संधि की शर्तों, भारत में अन्य मामलों के संबंध में हिरासत के आधार और संबंधित पक्षों की दलीलों पर आगे विचार किया जा सकता है।
इस मामले का कानूनी महत्व यह है कि प्रत्यर्पण के बाद किसी व्यक्ति के खिलाफ दूसरे अपराधों में कार्रवाई करते समय संधि की शर्तों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े वैधानिक प्रतिबंधों का पालन किस तरह किया जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक को मद्रास हाईकोर्ट के कानूनी निष्कर्षों पर अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।
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