सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक पूर्व शाखा प्रबंधक की पेंशन को दो-तिहाई तक सीमित करने के बैंक के आदेश को रद्द
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त शाखा प्रबंधक की पेंशन दो-तिहाई करने का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पेंशन घटाने से पहले बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से अनिवार्य परामर्श जरूरी है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक पूर्व शाखा प्रबंधक की पेंशन को दो-तिहाई तक सीमित करने के बैंक के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस अमित सेठ ने कहा कि कर्मचारी की पेंशन कम करने से पहले Employees’ Pension Regulations, 1995 के Regulation 33(2) के तहत बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से अनिवार्य परामर्श किया जाना चाहिए था।
अदालत ने माना कि बैंक यह साबित करने में विफल रहा कि पेंशन घटाने से पहले बोर्ड से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार परामर्श किया गया था। केवल जनरल मैनेजर को अधिकार सौंपे जाने का दावा इस वैधानिक आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकता।
36 साल की सेवा के बाद हुई थी अनिवार्य सेवानिवृत्ति
याचिकाकर्ता ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में करीब 36 वर्षों तक शाखा प्रबंधक के रूप में सेवा की थी। उनके खिलाफ कथित अनियमितताओं को लेकर 22 अक्टूबर 2009 को चार्जशीट जारी हुई और विभागीय जांच के बाद 26 मई 2011 को उन्हें दंडस्वरूप अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
उनकी विभागीय अपील भी 19 अगस्त 2011 को खारिज कर दी गई।
सेवानिवृत्ति के बाद बैंक के जनरल मैनेजर ने उनकी पेंशन को उस राशि के दो-तिहाई तक सीमित कर दिया, जो उन्हें पूर्ण पेंशन के रूप में मिलनी थी।
याचिकाकर्ता ने इस कटौती को चुनौती देते हुए कहा कि Regulation 33 के तहत पूर्ण पेंशन से कम पेंशन देने से पहले बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से परामर्श अनिवार्य था।
जनरल मैनेजर को अधिकार देने का तर्क नहीं माना
बैंक की ओर से दलील दी गई कि संबंधित शक्तियां जनरल मैनेजर को सौंप दी गई थीं। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि आंतरिक delegation या resolution किसी वैधानिक प्रावधान में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया को खत्म नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त material नहीं रखा गया जिससे यह साबित हो सके कि पेंशन घटाने से पहले बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से आवश्यक परामर्श किया गया था।
अदालत के अनुसार, पेंशन में कटौती करने वाला आदेश प्रशासनिक कारणों को भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं करता था। इसलिए उसे कानूनन कायम नहीं रखा जा सकता।
पूरी पेंशन का अधिकार, लेकिन पिछला बकाया सीमित
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का मामला यह नहीं था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति होते ही उसे हर परिस्थिति में पूरी पेंशन का असीमित अधिकार मिल गया।
मुद्दा यह था कि यदि पूर्ण पेंशन से कम राशि देनी है, तो ऐसा Regulation 33 में निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करते हुए ही किया जा सकता है।
अदालत ने इसलिए पेंशन को पूर्ण दर पर बहाल करने का निर्देश दिया।
हालांकि, याचिका दायर करने में हुई देरी को देखते हुए अदालत ने पुराने बकाये की वसूली को सीमित रखा। Limitation Act, 1963 के Article 7 को लागू करते हुए बकाया राशि याचिका दायर करने से पहले के अधिकतम तीन वर्षों तक सीमित की गई।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
इस फैसले का महत्व इसलिए है क्योंकि हाईकोर्ट ने पेंशन में कटौती को केवल बैंक के आंतरिक प्रशासनिक अधिकार का विषय नहीं माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब नियम किसी विशेष प्रक्रिया—जैसे Board of Directors से prior consultation—को अनिवार्य बनाते हैं, तो उसका पालन किए बिना कर्मचारी के पेंशन अधिकार को कम नहीं किया जा सकता।
मुख्य निष्कर्ष:
- पूर्ण पेंशन से कम पेंशन देने के लिए Regulation 33(2) की प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
- बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से पूर्व परामर्श अनिवार्य है।
- जनरल मैनेजर को powers delegate करना इस वैधानिक requirement का विकल्प नहीं है।
- प्रक्रिया का पालन साबित न होने पर पेंशन कटौती का आदेश टिकाऊ नहीं रहेगा।
- पेंशन पूर्ण दर पर बहाल होगी, लेकिन देरी के कारण पुराने arrears तीन साल तक सीमित किए जा सकते हैं।
फैसला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जस्टिस अमित सेठ, आदेश दिनांक 20 अगस्त 2026।
Tags
#मध्यप्रदेशहाईकोर्ट #पेंशन #सेंट्रलबैंकऑफइंडिया #पेंशनकटौती #बैंककर्मचारी #सेवानिवृत्ति #न्यायिकफैसला #Regulation33 #PensionRights #MadhyaPradeshHighCourt #CentralBankOfIndia #Pension #RetirementBenefits #ServiceLaw
