‘बेटी से दुष्कर्म पर पिता की सजा बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा — यह संविधान की आत्मा का अपमान है’

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‘Father’s sentence for raping his daughter upheld, Supreme Court said – this is an insult to the spirit of the Constitution’


“घर को शरणस्थली होना चाहिए, न कि ऐसा स्थान जो पीड़ा का स्रोत बने। ऐसे मामलों में न्यायपालिका को स्पष्ट संदेश देना होगा कि इन अपराधों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।”

🧾 विधि संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट ने बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि “महिला की गरिमा गैर-परक्राम्य है” और दया की याचना इस मामले में न्याय का अपमान होगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि घरों को सुरक्षित आश्रय की तरह देखा जाना चाहिए, न कि अवर्णनीय पीड़ा के स्थान के रूप में।

⚖️ शीर्ष अदालत ने मनुस्मृति का उल्लेख कर कहा — “यह सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, संवैधानिक दृष्टिकोण भी है”

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और संदीप कुमार की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्णय के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी, जिसमें पिता को POCSO Act की धारा 6 और IPC की धारा 506 के तहत दोषी ठहराया गया था।

कोर्ट ने प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति Manusmriti से एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा:

“यह श्लोक मात्र सांस्कृतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टि को भी प्रतिबिंबित करता है। महिला की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।”

🏛️ कोर्ट की तीखी टिप्पणी

पीठ ने कहा:

“जब एक पिता, जो कि रक्षक, मार्गदर्शक और नैतिक दिशा-निर्देशक होना चाहिए, वही अपनी संतान की शारीरिक गरिमा को रौंदता है, तो यह व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत विश्वासघात होता है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“घर को शरणस्थली होना चाहिए, न कि ऐसा स्थान जो पीड़ा का स्रोत बने। ऐसे मामलों में न्यायपालिका को स्पष्ट संदेश देना होगा कि इन अपराधों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।”

⚖️ पुनर्विचार याचिका पर क्या कहा कोर्ट ने?

याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया था कि पारिवारिक मतभेद और बेटियों के प्रेम-संबंधों की अस्वीकृति के कारण उसे झूठा फंसाया गया। कोर्ट ने इसे “पूरी तरह खोखला” करार देते हुए खारिज कर दिया।

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कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने:

  • पीड़िता की मौखिक गवाही,
  • उसकी बड़ी बहन की पुष्टि,
  • और फोरेंसिक व मेडिकल साक्ष्य का गहन विश्लेषण कर उचित निर्णय लिया।

डीएनए रिपोर्ट DNA Report ने अभियोजन पक्ष की कहानी को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया।

👧 पीड़िता को ₹10,50,000 का मुआवज़ा

निपुण सक्सेना बनाम भारत सरकार (2019) के निर्णय का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता को ₹10,50,000/- की क्षतिपूर्ति राशि प्रदान करने का निर्देश दिया।

🛑 सुधार या पुनर्वास के नाम पर रियायत संभव नहीं

कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा:

“इस प्रकार की ‘रक्त-संबंधी यौन हिंसा’ पारिवारिक विश्वास की नींव को चीर देती है और इसे भाषा व सजा दोनों में सबसे कड़े रूप में निंदा मिलनी चाहिए।”

“ऐसी याचिकाएं न्यायालय के संवैधानिक कर्तव्य और प्रत्येक बालिका से किए गए संविधानिक वादे के साथ विश्वासघात हैं।”

⚖️ निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक सजा की पुष्टि नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की ओर से यह संदेश है कि बेटियों की गरिमा के खिलाफ अपराधों पर कोई सहानुभूति नहीं बरती जाएगी। यह निर्णय न्याय और संवैधानिक नैतिकता के संरक्षण की दिशा में एक दृढ़ और निर्णायक कदम है।

📄 मामला:

भनेई प्रसाद @ राजू बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य

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