न्यायिक अधिकारी को रिफ्रेशर कोर्स और नियमित प्रशिक्षण लेने का निर्देश
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के एक आदेश को यांत्रिक और बिना सोच-विचार के पारित बताया। कोर्ट ने बीमा कंपनी को मुआवजे की देनदारी से मुक्त करते हुए संबंधित न्यायिक अधिकारी को रिफ्रेशर कोर्स और नियमित प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के एक मामले में यांत्रिक और बिना सोच-विचार के आदेश पारित करने पर संबंधित न्यायिक अधिकारी के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि अधिकरण का फैसला पूरी तरह दिमाग का इस्तेमाल किए बिना पारित किया गया और उसमें मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की बुनियादी जानकारी का भी अभाव दिखाई देता है।
जस्टिस सुशील कुकरेजा ने 29 अक्टूबर को पारित आदेश में बीमा कंपनी की अपील स्वीकार करते हुए उसे मुआवजे की देनदारी से मुक्त कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को हिमाचल प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी में MACT मामलों से संबंधित रिफ्रेशर कोर्स और समय-समय पर प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया।
हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को फैसले की एक प्रति संबंधित न्यायिक अधिकारी की सर्विस रिकॉर्ड में रखने और दूसरी प्रति न्यायिक अकादमी के निदेशक को भेजने का भी निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा, “विदा लेने से पहले, इस अदालत की सुविचारित राय में, निचले अधिकरण द्वारा पारित आदेश संबंधित न्यायिक अधिकारी की ओर से पूरी तरह दिमाग का इस्तेमाल न किए जाने को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।”
न्यायिक अधिकारी के आदेश पर हाई कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
एकल पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह काफी चौंकाने वाला है कि न्यायिक अधिकारी ने ऐसी बीमा पॉलिसी के आधार पर फैसला कर दिया, जिसका दुर्घटना से कोई संबंध ही नहीं था।
कोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारी एक्ट/लायबिलिटी ओनली पॉलिसी और कॉम्प्रिहेंसिव/पैकेज पॉलिसी के बीच अंतर भी नहीं समझ सके। यह स्थिति तब और गंभीर है, जब संबंधित अधिकारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर रहते हुए जिला न्यायपालिका का नेतृत्व कर रहे थे और MACT मामलों की सुनवाई भी कर रहे थे।
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की:
“जिला न्यायपालिका के प्रमुख से इस तरह का आदेश पारित करने की अपेक्षा नहीं की जाती, जिसमें मोटर वाहन अधिनियम की बुनियादी जानकारी तक का अभाव हो।”
कोर्ट ने कहा कि जिला न्यायपालिका न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ है और आम नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच का सबसे प्रमुख माध्यम है। ऐसे में न्यायिक आदेश बिना तथ्यों और कानून पर विचार किए यांत्रिक तरीके से पारित नहीं किए जा सकते।
पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की ओर से इस तरह का रवैया निंदनीय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी ने बीमा पॉलिसी को ठीक से देखने तक की जहमत नहीं उठाई।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 44 वर्षीय पेंटर त्रहरू उर्फ केशव की सड़क दुर्घटना में मौत से जुड़ा है। 30 दिसंबर 2016 को वह जिस कार में सवार थे, वह मंडी जिले में सुंदरनगर के पास बेह-की-धार में पहाड़ी से लुढ़ककर खेतों में जा गिरी थी।
इस दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। इसके बाद मृतक की पत्नी और बेटे ने MACT के समक्ष 50 लाख रुपये के मुआवजे का दावा दाखिल किया। उन्होंने आरोप लगाया कि दुर्घटना वाहन चालक की तेज और लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण हुई थी।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 16 अगस्त 2023 को अपना फैसला सुनाते हुए 13,93,100 रुपये का मुआवजा छह प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ देने का आदेश दिया था।
अधिकरण ने सभी प्रतिवादियों को संयुक्त रूप से और अलग-अलग मुआवजे के भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया था। साथ ही, बीमा कंपनी को मुआवजे की राशि जमा करने का निर्देश दिया था।
बीमा कंपनी ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी?
बीमा कंपनी ने अधिकरण के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। कंपनी की ओर से दलील दी गई कि दुर्घटना के समय वाहन को कवर करने वाली बीमा पॉलिसी केवल एक्ट/थर्ड पार्टी लायबिलिटी पॉलिसी थी।
इस पॉलिसी के तहत निजी कार में यात्रा करने वाले यात्रियों की मृत्यु या शारीरिक चोट के जोखिम को कवर नहीं किया गया था।
बीमा कंपनी ने कहा कि वाहन में यात्रा कर रहे यात्रियों के जोखिम को कवर करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम भी जमा नहीं किया गया था। इसलिए कंपनी को वाहन मालिक की ओर से मुआवजे का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने बीमा पॉलिसी में क्या खामियां पाईं?
रिकॉर्ड की जांच के दौरान हाई कोर्ट ने अधिकरण के फैसले में कई गंभीर त्रुटियां पाईं।
कोर्ट ने पाया कि दुर्घटना 30 दिसंबर 2016 को हुई थी, जबकि अधिकरण ने जिस बीमा पॉलिसी पर भरोसा किया था, वह सितंबर 2015 से सितंबर 2016 तक ही वैध थी। यानी दुर्घटना से पहले ही वह पॉलिसी समाप्त हो चुकी थी।
दुर्घटना की तारीख पर वाहन के लिए एक दूसरी बीमा पॉलिसी प्रभावी थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि दुर्घटना के समय लागू पॉलिसी केवल थर्ड पार्टी लायबिलिटी पॉलिसी थी। इसमें निजी कार में सवार यात्रियों के जोखिम को कवर करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम जमा नहीं किया गया था।
कोर्ट ने मृतक को ग्रैच्युटस पैसेंजर (Gratuitous Passenger) यानी बिना किसी अतिरिक्त बीमा कवर के निजी कार में यात्रा करने वाला यात्री माना। पीठ के अनुसार, संबंधित पॉलिसी के तहत वह थर्ड पार्टी की परिभाषा में शामिल नहीं था।
इसलिए अतिरिक्त बीमा कवर के अभाव में बीमा कंपनी को मुआवजे का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकरण को बीमा कंपनी को मुआवजे की देनदारी से मुक्त कर देना चाहिए था, लेकिन उसने गलत तरीके से कंपनी को वाहन मालिक की ओर से मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहरा दिया।
कोर्ट ने कहा:
“चूंकि निजी कार में सवार व्यक्ति थर्ड पार्टी की परिभाषा में नहीं आता और वह केवल एक ग्रैच्युटस पैसेंजर है, इसलिए अपीलकर्ता बीमा कंपनी याचिकाकर्ताओं को कोई मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी नहीं है, क्योंकि कार में सवार व्यक्ति की मृत्यु या शारीरिक चोट के जोखिम को कवर करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम जमा नहीं किया गया था।”
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने MACT के फैसले में संशोधन करते हुए बीमा कंपनी को मुआवजे की देनदारी से मुक्त कर दिया।
इसके अलावा, मामले के निपटारे में सामने आई गंभीर न्यायिक त्रुटियों को देखते हुए संबंधित न्यायिक अधिकारी को MACT मामलों में रिफ्रेशर कोर्स करने और नियमित प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की सर्विस रिकॉर्ड में फैसले की प्रति रखने और न्यायिक अकादमी के निदेशक को भी इसकी प्रति भेजने का आदेश दिया।
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