धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के नियमन पर सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष तक के बच्चों को धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण और निगरानी की मांग वाली PIL पर सुनवाई से इनकार किया। याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ली।
सुप्रीम कोर्ट ने PIL पर सुनवाई से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र और सभी राज्य सरकारों को 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और/या धार्मिक शिक्षा देने वाले प्रत्येक संस्थान का पंजीकरण, मान्यता, पर्यवेक्षण और निगरानी सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार किया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली। कोर्ट ने उन्हें उचित मंच के समक्ष अपनी कानूनी remedy अपनाने की अनुमति दे दी।
धार्मिक शिक्षा को धर्म के प्रचार से जोड़ा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता उपाध्याय ने दलील दी कि धार्मिक शिक्षा प्रदान करना अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के प्रचार को बढ़ावा देने के समान है।
याचिका में इस मुद्दे को संवैधानिक अधिकारों और बच्चों के शिक्षा के अधिकार से जोड़ते हुए ऐसे सभी संस्थानों के लिए एक प्रभावी नियामक व्यवस्था की मांग की गई थी।
अनुच्छेद 30 की व्याख्या को लेकर उठाया सवाल
याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि संविधान का अनुच्छेद 30 केवल उन अल्पसंख्यक संस्थानों को संरक्षण देता है जो धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करते हैं। याचिका के अनुसार, यह संरक्षण धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों तक विस्तारित नहीं होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 30 में इस्तेमाल किए गए शब्द “educational institutions of their choice” का अर्थ धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित होना चाहिए, न कि धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों तक।
अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संस्थानों को रखने की मांग
PIL में तर्क दिया गया कि जो संस्थान धार्मिक शिक्षा प्रदान करके धर्म को बढ़ावा देते हैं, उन्हें संविधान के अनुच्छेद 26 के दायरे में रखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 26 धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन से संबंधित अधिकारों की बात करता है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि अनुच्छेद 30 वास्तव में अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के अधिकार का एक विशेष रूप से उल्लेख मात्र है और यह अन्य नागरिकों को उपलब्ध अधिकारों से अलग कोई अतिरिक्त अधिकार या विशेषाधिकार प्रदान नहीं करता।
14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नियामक व्यवस्था की मांग
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों को पंजीकृत और मान्यता प्राप्त कराने तथा उनकी नियमित निगरानी के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21A को अनुच्छेद 14, 15, 16, 39(f), 45 और 51A(k) के साथ पढ़ते हुए तर्क दिया कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना और उनके कल्याण एवं सुरक्षा को सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
सीमा क्षेत्रों में कथित अनियमित संस्थानों का मुद्दा
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने इस वर्ष की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों का दौरा किया था। वहां उन्हें कथित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान मिले जो पंजीकृत या मान्यता प्राप्त नहीं थे।
PIL में दावा किया गया कि देश के अन्य सीमावर्ती जिलों में भी ऐसे संस्थानों की संख्या बढ़ रही है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन संस्थानों पर नियामक निगरानी की कमी बच्चों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ उनके कल्याण और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
‘Minority’ की संवैधानिक परिभाषा का मुद्दा
याचिका में ‘अल्पसंख्यक’ (Minority) शब्द की वैधानिक परिभाषा नहीं होने का मुद्दा भी उठाया गया।
याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को ‘Minority’ की परिभाषा तय करने और अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित करने का निर्देश देने की मांग की। वैकल्पिक रूप से सुप्रीम कोर्ट से इस संबंध में उपयुक्त दिशानिर्देश तैयार करने का अनुरोध किया गया।
याचिका वापस लेने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करने के बाद याचिकाकर्ता को इसे वापस लेने की अनुमति दे दी। साथ ही उन्हें उचित मंच के समक्ष अपनी कानूनी remedy अपनाने की स्वतंत्रता दी गई।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के नियमन, अनुच्छेद 30 के दायरे या ‘Minority’ की परिभाषा से जुड़े उठाए गए संवैधानिक सवालों पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की।
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