22 FIR वाले आरोपी को अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाई कोर्ट का आदेश रद्द

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आपराधिक इतिहास अकेले ही राहत से इनकार के लिए पर्याप्त

सुप्रीम कोर्ट ने 22 FIR वाले आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा कि आपराधिक इतिहास अकेले ही राहत से इनकार के लिए पर्याप्त है।


सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश

Supreme Court of India ने अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि आरोपी का आपराधिक इतिहास (criminal antecedents) अपने आप में जमानत से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है। कोर्ट ने 22 FIR दर्ज होने के बावजूद दी गई अग्रिम जमानत को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया।


हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

न्यायमूर्ति J.B. Pardiwala और न्यायमूर्ति Vijay Bishnoi की खंडपीठ ने Allahabad High Court के 28 जनवरी 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंगत और कानून के सिद्धांतों के विपरीत माना।


22 FIR के बावजूद मिली थी राहत

मामले में आरोपी के खिलाफ विभिन्न आपराधिक मामलों में कुल 22 FIR दर्ज थीं। इसके बावजूद हाई कोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत प्रदान कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड के बावजूद राहत देना न्यायिक विवेक का गलत इस्तेमाल है।


गंभीर धाराओं में दर्ज थे मामले

आरोपी पर Indian Penal Code की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी), 468 (फर्जी दस्तावेज) और 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) के तहत आरोप लगे थे। ये सभी गंभीर आर्थिक अपराध की श्रेणी में आते हैं, जिनमें जांच और साक्ष्य की संवेदनशीलता अधिक होती है।

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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने कहा कि यह “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” है कि हाई कोर्ट को आरोपी के आपराधिक इतिहास की जानकारी होने के बावजूद उसे अग्रिम जमानत दी गई। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी पहले से ही एक अन्य मामले में न्यायिक हिरासत में था।


आरोपी की गैर-हाजिरी पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद आरोपी न तो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ और न ही उसके वकील ने अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखा। इससे भी सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया।


‘आपराधिक इतिहास ही पर्याप्त आधार’

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी का आपराधिक इतिहास ही अग्रिम जमानत से इनकार करने के लिए पर्याप्त था। इस टिप्पणी से अदालत ने यह संकेत दिया कि जमानत देते समय अदालतों को आरोपी के पिछले रिकॉर्ड को प्राथमिकता से देखना चाहिए।


अपील स्वीकार, जमानत रद्द

अदालत ने अपीलकर्ता (de facto complainant) की दलीलों को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत समाप्त कर दी। साथ ही लंबित सभी आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।


फैसले का महत्व

यह फैसला जमानत कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बार-बार अपराध में संलिप्त रहने वाले आरोपियों को राहत देने में न्यायालयों को अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी।

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केस संदर्भ

यह निर्णय Sharad Sehgal v. State of U.P. (क्रिमिनल अपील, SLP (Crl.) No. 5309/2026) में 27 अप्रैल 2026 को दिया गया।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निचली अदालतों और हाई कोर्ट के लिए स्पष्ट संदेश है कि अग्रिम जमानत देते समय आरोपी के आपराधिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह फैसला न्यायिक विवेक और सार्वजनिक हित के संतुलन को फिर से रेखांकित करता है।


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