‘निजी ठेकेदारों के हित में सार्वजनिक परियोजनाओं को रोकना न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य नहीं’ – इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य निजी ठेकेदारों के हितों की रक्षा नहीं बल्कि सार्वजनिक हित की सुरक्षा है। बोली में तथ्यों को छिपाने पर याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा — “इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स मामूली तकनीकी त्रुटियों पर नहीं रुकने चाहिए।”

🧑‍⚖️ ‘निजी ठेकेदारों के हित में सार्वजनिक परियोजनाओं को रोकना न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य नहीं’ – इलाहाबाद हाईकोर्ट
– बोली में तथ्यों को छिपाने पर याचिका खारिज

लखनऊ | विधि संवाददाता इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति का उपयोग कभी भी निजी हितों की रक्षा के लिए सार्वजनिक हित के नुकसान पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ठेकेदार या बोलीदाता (tenderer) यदि किसी निर्णय से असंतुष्ट हैं, तो वे नागरिक न्यायालय में क्षतिपूर्ति (damages) का दावा कर सकते हैं, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में अदालतों का हस्तक्षेप वांछनीय नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार और न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ की खंडपीठ ने एक निर्माण कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए पारित किया। याचिका में बरेली पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) द्वारा टेंडर प्रक्रिया में याचिकाकर्ता की बोली को खारिज करने के फैसले को चुनौती दी गई थी।


⚖️ मामला क्या था?

याचिकाकर्ता M/S A.S. Traders एक निर्माण कंपनी है जो सड़कों के निर्माण का कार्य करती है। उसने प्रतापगढ़ जिले के लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा जारी ई-टेंडर में भाग लिया था। यह बोली ‘प्रहरी पोर्टल’ पर ‘चाणक्य सॉफ्टवेयर’ के माध्यम से जमा की गई थी।

याचिकाकर्ता ने अपने प्रतिस्पर्धी M/S अरुणिमा कंस्ट्रक्शंस की बोली को “गैर-जवाबी” बताते हुए आपत्ति दर्ज की थी। लेकिन तकनीकी मूल्यांकन के बाद विभाग ने याचिकाकर्ता सहित चार अन्य बोलीदाताओं की बोली खारिज कर दी और टेंडर M/S अरुणिमा कंस्ट्रक्शंस को दे दिया।

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इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर टेंडर रद्द करने और अपने प्रस्ताव पर पुनर्विचार की मांग की।


⚖️ हाईकोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने कहा —

न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णयों की वैधता जांचना है, न कि उनके व्यावसायिक या तकनीकी पहलुओं पर निर्णय देना।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि टेंडर और अनुबंध (contracts) व्यावसायिक प्रकृति के होते हैं। ऐसे मामलों में अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या सार्वजनिक हित के प्रतिकूल हो।

“यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है और निर्णय सद्भावनासार्वजनिक हित में लिया गया है, तो मामूली तकनीकी त्रुटियों के आधार पर भी अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए,”
पीठ ने कहा।


⏱️ 72 घंटे की आपत्ति अवधि पर कोर्ट की सख्ती

अदालत ने कहा कि शासनादेश दिनांक 25 अगस्त 2020 के अनुसार आपत्ति दर्ज करने के लिए 72 घंटे की अवधि निर्धारित की गई है। यदि यह अवधि बीत जाती है, तो बोलीदाता को बाद में कोई नई आपत्ति दर्ज करने का अधिकार नहीं रह जाता।

पीठ ने टिप्पणी की —

“यदि आपत्ति की कोई समय सीमा तय न हो, तो बोलीदाता अनिश्चितकाल तक आपत्तियाँ दर्ज करते रहेंगे, जिससे सार्वजनिक परियोजनाएँ ठप हो जाएंगी और राजकोषीय हानि होगी।”

अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने न तो इस देरी का कोई औचित्य बताया और न ही दुर्भावना के आरोपों का ठोस प्रमाण प्रस्तुत किया।


⚖️ ‘क्लीन हैंड्स’ का सिद्धांत

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की बोली को प्रासंगिक तथ्यों को छिपाने (concealment) के कारण खारिज किया गया था।

“जो बोलीदाता ‘क्लीन हैंड्स’ से टेंडर नहीं दाखिल करता, उसे किसी भी प्रकार का लाभ नहीं दिया जा सकता,”
पीठ ने कहा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता को कोई क्षति हुई है, तो वह सिविल कोर्ट में हर्जाने (damages) का दावा कर सकता है, लेकिन हाईकोर्ट अनुबंधीय विवादों में दखल नहीं देगा।

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⚖️ सार्वजनिक हित सर्वोपरि

पीठ ने चेतावनी दी कि इस तरह की याचिकाओं पर हस्तक्षेप करने से सार्वजनिक परियोजनाएँ प्रभावित होती हैं —

“यदि हर असंतुष्ट बोलीदाता न्यायिक समीक्षा का सहारा लेगा, तो राज्य की आधारभूत संरचना परियोजनाएँ ठप हो जाएंगी। यह राजकोष को भारी नुकसान पहुंचाएगा और सार्वजनिक हित के विरुद्ध होगा।”

अंततः, अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की याचिका तकनीकी और असार आधार पर दायर की गई थी। इसलिए इसमें हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता।


🧾 निर्णय:
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया सार्वजनिक हित में और विधि अनुसार पूरी की गई थी।


मामले का शीर्षक: M/S A.S. Traders v. State of U.P.


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