क्रिमिनल केस के बाद दोबारा कार्रवाई नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने IAF अफसर की बर्खास्तगी रद्द की

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सुप्रीम कोर्ट ने 1987 रेगिस्तान घटना में IAF अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द की; कहा—एक बार क्रिमिनल ट्रायल चुनने के बाद दोबारा विभागीय कार्रवाई अवैध।


एक महत्वपूर्ण फैसले में Supreme Court of India ने भारतीय वायुसेना के एक अधिकारी की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम प्राधिकारी ने कोर्ट मार्शल के बजाय आपराधिक अदालत में मुकदमा चलाने का विकल्प चुना और आरोपी को डिस्चार्ज कर दिया गया, तो उसी आधार पर बाद में विभागीय कार्रवाई शुरू करना कानूनन अस्वीकार्य है।


🔹 पीठ और फैसला

जस्टिस Dipankar Datta और जस्टिस K. V. Viswanathan की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए 1993 की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा:
👉 “एक बार रास्ता चुन लिया जाए, तो उसी पर अंत तक चलना होगा।”


🔹 क्या था पूरा मामला

मामला 29 मार्च 1987 की एक घटना से जुड़ा था, जब थार रेगिस्तान में तैनात IAF अधिकारी ने अपने वरिष्ठ के निर्देश पर एक GREF ड्राइवर को कैंप से बाहर छोड़ दिया।

बाद में:

  • ड्राइवर का शव बरामद हुआ
  • FIR दर्ज हुई
  • और जांच शुरू हुई

🔹 क्रिमिनल कोर्ट में क्या हुआ

वायुसेना ने Air Force Act 1950 की धारा 124 के तहत कोर्ट मार्शल की बजाय क्रिमिनल कोर्ट में ट्रायल का विकल्प चुना।

👉 1990 में सेशन कोर्ट ने सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया
👉 यह आदेश कभी चुनौती नहीं दी गई और अंतिम हो गया

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🔹 फिर भी हुई विभागीय कार्रवाई

इसके बावजूद:

  • 1990 में अधिकारी को शो-कॉज नोटिस जारी हुआ
  • 1993 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया

🔹 सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने कहा:

  • डिस्चार्ज का मतलब है कि आरोपों में prima facie आधार नहीं है
  • ऐसे में उसी आधार पर आगे कार्रवाई करना non est (शून्य) है

कोर्ट ने Union of India v. Harjeet Singh Sandhu का हवाला देते हुए कहा:
👉 एक बार क्रिमिनल ट्रायल का रास्ता चुना गया, तो बाद में विभागीय कार्रवाई नहीं की जा सकती


🔹 प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन

अदालत ने यह भी पाया कि:

  • अधिकारी के जवाब पर विचार नहीं किया गया
  • “morally convincing evidence” जैसे अस्पष्ट आधार पर निर्णय लिया गया

👉 इसे कोर्ट ने मनमाना और गैरकानूनी बताया


🔹 सजा को बताया असंगत

कोर्ट ने कहा:

  • अधिकारी ने अपने वरिष्ठ के आदेश का पालन किया था
  • उनके खिलाफ कोई दुर्भावना (intent) नहीं थी

वहीं:

  • वरिष्ठ अधिकारी को केवल “severe displeasure” मिला
  • जबकि अपीलकर्ता को बर्खास्त कर दिया गया

👉 यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है (Sengara Singh v. State of Punjab)


🔹 कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • बर्खास्तगी आदेश रद्द किया
  • 50% बैक वेजेज देने का निर्देश दिया
  • नोटIONAL प्रमोशन और पेंशन लाभ देने को कहा
  • 9% ब्याज के साथ भुगतान का आदेश दिया

🔹 “सम्मान की बहाली सबसे जरूरी”

कोर्ट ने कहा:
👉 “एक सैनिक के लिए सम्मान (honour) की बहाली सबसे महत्वपूर्ण है।”

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अदालत ने निर्देश दिया कि:

  • अधिकारी को सामान्य तरीके से सेवा से रिटायर दिखाया जाए
  • उनकी गरिमा बहाल की जाए

🔹 कानूनी महत्व

यह फैसला स्पष्ट करता है कि:

  • एक ही तथ्य पर दोहरी कार्रवाई (double jeopardy जैसी स्थिति) स्वीकार्य नहीं
  • प्रशासनिक निर्णयों में
    👉 पारदर्शिता
    👉 और उचित प्रक्रिया (due process) अनिवार्य है

🔹 निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल एक अधिकारी को न्याय दिलाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि सैन्य और प्रशासनिक कार्रवाई कानून की सीमाओं के भीतर ही हो।


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