चेक बाउंस केस में अहम फैसला: चेक बाउंस मामलों में डिमांड नोटिस में चेक नंबर का उल्लेख अनिवार्य
गौहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस मामलों में डिमांड नोटिस में चेक नंबर का उल्लेख अनिवार्य है। बिना चेक नंबर और सही तारीख वाले नोटिस को वैध कानूनी नोटिस नहीं माना जा सकता।
Gauhati High Court ने चेक बाउंस मामलों में डिमांड नोटिस की वैधता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि नोटिस में संबंधित चेक नंबर का उल्लेख नहीं है, तो उसे Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 के तहत वैध कानूनी मांग नोटिस नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति Mitali Thakuria की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि चेक नंबर डिमांड नोटिस का सबसे आवश्यक हिस्सा होता है और इसके बिना आरोपी यह समझ ही नहीं सकता कि मांग किस लेन-देन या चेक से संबंधित है।
6 लाख रुपये का चेक हुआ था बाउंस
मामले के अनुसार, आरोपी ने कथित वैध देनदारी के निर्वहन के लिए शिकायतकर्ता के पक्ष में 6 लाख रुपये का चेक जारी किया था। जब शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में जमा किया, तो वह “पर्याप्त धनराशि नहीं” (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को 15 दिनों के भीतर भुगतान करने के लिए कानूनी डिमांड नोटिस भेजा। नोटिस प्राप्त होने के बावजूद आरोपी ने कोई जवाब नहीं दिया, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने धारा 138 और 142 एनआई एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया।
आरोपी ने कहा- 1 लाख का कर्ज पहले ही चुका दिया था
आरोपी ने अदालत में दावा किया कि उसने केवल 1 लाख रुपये का ऋण लिया था, जिसे वह पहले ही चुका चुका है। इसके समर्थन में उसने बैंक स्टेटमेंट और धनराशि प्राप्ति रसीद भी पेश की।
उसका कहना था कि उसने सुरक्षा के तौर पर 3-4 खाली चेक दिए थे और जिस चेक के आधार पर 6 लाख रुपये की मांग की जा रही है, उसके संबंध में कोई वैध देनदारी मौजूद नहीं थी।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को किया था बरी
साक्ष्य रिकॉर्ड होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने तीन प्रमुख मुद्दे तय किए:
- क्या चेक किसी वैध देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था?
- क्या चेक “इंसफिशिएंट फंड्स” के कारण बाउंस हुआ?
- क्या आरोपी ने शिकायतकर्ता द्वारा भेजा गया डिमांड नोटिस प्राप्त किया था?
ट्रायल कोर्ट ने दूसरे मुद्दे को शिकायतकर्ता के पक्ष में माना, लेकिन बाकी दो मुद्दों पर शिकायतकर्ता अपना मामला साबित नहीं कर सका। संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने नोटिस की खामियों को माना गंभीर
अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि डिमांड नोटिस में न तो चेक नंबर का उल्लेख था और न ही चेक की सही तारीख दर्ज थी।
नोटिस में 5 अप्रैल 2014 की तारीख लिखी गई थी, जबकि वास्तविक चेक 5 अप्रैल 2017 का था। शिकायतकर्ता ने इसे टाइपिंग की गलती बताते हुए सुधार की बात कही, लेकिन अदालत ने कहा कि न तो कोई संशोधित नोटिस भेजा गया और न ही कानूनी रूप से गलती सुधारी गई।
कोर्ट ने कहा कि यदि चेक नंबर का उल्लेख होता, तो तारीख की त्रुटि को शायद तकनीकी गलती माना जा सकता था। लेकिन यहां सबसे आवश्यक विवरण ही अनुपस्थित था।
“चेक नंबर सबसे जरूरी विवरण”
अदालत ने स्पष्ट कहा:
“डिमांड नोटिस को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए और उसमें चेक नंबर का होना अनिवार्य है। इसके बिना नोटिस कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।”
कोर्ट ने माना कि बिना चेक नंबर और सही तारीख के यह समझना संभव नहीं था कि भुगतान की मांग किस चेक या लेन-देन के संदर्भ में की गई है।
इसलिए ऐसा नोटिस Section 138 of Negotiable Instruments Act के तहत वैध कानूनी मांग नोटिस नहीं माना जा सकता।
धारा 139 के तहत आरोपी ने सफलतापूर्वक rebuttal किया
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि Section 139 of Negotiable Instruments Act के तहत आरोपी को केवल संभावनाओं के संतुलन (preponderance of probabilities) के आधार पर अपना बचाव स्थापित करना होता है।
इसके लिए आरोपी को हमेशा स्वतंत्र साक्ष्य पेश करना जरूरी नहीं होता; वह शिकायतकर्ता के दस्तावेजों पर भी भरोसा कर सकता है।
अदालत ने पाया कि आरोपी ने न केवल शिकायतकर्ता के दस्तावेजों का सहारा लिया बल्कि अपने समर्थन में बैंक रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज भी पेश किए, जिससे उसका बचाव मजबूत हुआ।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस चरण पर डिमांड नोटिस में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
यह फैसला चेक बाउंस मामलों में कानूनी नोटिस की तकनीकी और वैधानिक आवश्यकताओं को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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