विवाह के 7 वर्ष के भीतर महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु, इलाहाबाद HC द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत रद्द – SC

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दहेज मृत्यु मामलों में नरमी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल एक वर्ष में पूरा करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु मामले में आरोपी पति को दी गई इलाहाबाद हाईकोर्ट की जमानत रद्द करते हुए कहा कि FIR में कथित देरी या मौत के कारण की सतही व्याख्या जमानत का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने ट्रायल एक वर्ष में पूरा करने का निर्देश दिया।

Supreme Court of India ने दहेज मृत्यु के एक गंभीर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

न्यायमूर्ति JB Pardiwala और न्यायमूर्ति Vijay Bishnoi की खंडपीठ ने कहा कि दहेज हत्या जैसे गंभीर मामलों में FIR दर्ज होने में कथित देरी या मौत के कारण की सतही व्याख्या के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां विवाह के सात वर्ष के भीतर महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई हो और उसके साथ दहेज के लिए क्रूरता के प्रथमदृष्टया साक्ष्य मौजूद हों, वहां अदालतों को Section 118 of Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 के तहत लागू वैधानिक अनुमान को ध्यान में रखना अनिवार्य है।

शादी के बाद शुरू हुई थी दहेज प्रताड़ना

मामले के अनुसार मृतका का विवाह 8 फरवरी 2019 को आरोपी से हुआ था। अभियोजन का आरोप था कि शादी के तुरंत बाद पति और उसके परिवार ने दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

FIR के अनुसार, विवाह में कार, नकदी, आभूषण और घरेलू सामान सहित पर्याप्त दहेज दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद आरोपी पक्ष ने अतिरिक्त रूप से फॉर्च्यूनर कार और 10 लाख रुपये की मांग की।

मृतका को कथित रूप से मारपीट, भूखा रखने और जान से मारने की धमकियां दी जाती थीं। शिकायतकर्ता पिता ने दबाव में आकर 4 लाख रुपये सहित अन्य रकम भी दी, लेकिन उत्पीड़न जारी रहा।

संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत

11 जुलाई 2024 को मृतका अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई। उसी सुबह उसने अपने पिता से फोन पर बात करते हुए बताया था कि उसके साथ मारपीट हो रही है और उसे धमकाया जा रहा है।

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बाद में शिकायतकर्ता को सूचना मिली कि आरोपी पक्ष ने उसकी बेटी की गला दबाकर हत्या कर दी और शव को फांसी पर लटका दिया। मृतका का शव अस्पताल में मिला, जिस पर कई चोटों के निशान थे और ससुराल पक्ष का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था।

12 जुलाई 2024 को Kavi Nagar Police Station में FIR दर्ज कराई गई, जिसमें आठ लोगों को नामजद किया गया।

सेशन कोर्ट ने जमानत ठुकराई, हाईकोर्ट ने दी राहत

जांच के बाद आरोपी पति और उसके माता-पिता के खिलाफ Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 की विभिन्न धाराओं तथा Dowry Prohibition Act, 1961 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।

सेशन कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि बाद में Allahabad High Court ने FIR में कथित देरी और पोस्टमार्टम में “फांसी से दम घुटने” की बात का उल्लेख करते हुए आरोपी को जमानत दे दी।

इसके खिलाफ मृतका के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हाईकोर्ट से हुई “गंभीर गलती”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। अदालत ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर निशान, शरीर पर कई चोटें और खरोंच जैसी एंटी-मॉर्टम चोटों का उल्लेख था, जो प्रथमदृष्टया गला दबाने की ओर संकेत करते हैं।

पीठ ने सवाल उठाया:

“एफआईआर दर्ज करने में देरी कहां है? और यदि थोड़ी देरी मान भी ली जाए, तो क्या दहेज मृत्यु जैसे गंभीर अपराध में यह जमानत का आधार बन सकता है?”

अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने Section 118 BSA के तहत लागू वैधानिक अनुमान पर विचार ही नहीं किया, जबकि यह प्रावधान कहता है कि यदि मृत्यु से ठीक पहले दहेज प्रताड़ना साबित होती है, तो अदालत दहेज मृत्यु का अनुमान लगाएगी।

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दहेज हत्या पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु को समाज की गंभीर समस्या बताते हुए भावुक टिप्पणी भी की। अदालत ने कहा कि एक लड़की शादी बड़े सपनों के साथ करती है—सुखी वैवाहिक जीवन, प्रेम और परिवार की उम्मीद लेकर—“वह दहेज के लिए अपने ससुराल में बेरहमी से मारे जाने के लिए शादी नहीं करती।”

कोर्ट ने राष्ट्रीय आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2023 में देशभर में 6156 दहेज मृत्यु के मामले सामने आए, जिनमें उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर रहा जहां 2122 महिलाओं की मौत हुई। बिहार में 1143 मामले दर्ज हुए।

आरोपी को एक सप्ताह में सरेंडर का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द करते हुए आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को मुकदमे का निस्तारण एक वर्ष के भीतर पूरा करने का आदेश दिया गया।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके अवलोकन केवल जमानत याचिका के निर्णय तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का मूल्यांकन करेगा।

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