सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों को लेकर छात्रों के खिलाफ दर्ज FIRs रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 लोगों के खिलाफ नई FIR दर्ज करने की अनुमति भी दी।
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के सिलसिले में छात्रों के खिलाफ दर्ज FIRs को रद्द करने का आदेश दिया है। अदालत ने युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने की बात कही।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस राहत को सभी प्रदर्शनकारियों तक विस्तारित नहीं किया। केंद्र सरकार के अनुरोध पर अदालत ने दिल्ली पुलिस को उन 2,873 लोगों के खिलाफ नई FIR दर्ज करने की अनुमति दी है, जिनके बारे में पुलिस का दावा है कि वे प्रदर्शन में मौजूद थे और उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
छात्रों के खिलाफ पुराने मामलों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए पहले से दर्ज आपराधिक मामलों को आगे नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया।
अदालत ने माना कि छात्र जीवन में दर्ज आपराधिक मामले उनके भविष्य और करियर पर गंभीर असर डाल सकते हैं। इसी संदर्भ में कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए छात्रों को राहत प्रदान की।
गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के खिलाफ अलग कार्रवाई
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा कि प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों को छात्रों के समान राहत नहीं दी जानी चाहिए। सरकार के अनुसार, कुछ ऐसे लोग भी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे जिनका गंभीर आपराधिक इतिहास है।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। इन दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को 2,873 ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ अलग से FIR दर्ज कर जांच करने की अनुमति दी, जिनकी पहचान पुलिस ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के रूप में की है।
अनुच्छेद 142 के तहत ‘पूर्ण न्याय’
सुप्रीम कोर्ट का आदेश इस मायने में महत्वपूर्ण है कि अदालत ने एक ही प्रदर्शन से जुड़े लोगों के मामलों में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया है।
जहां छात्रों को उनके भविष्य और करियर पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए राहत दी गई, वहीं गंभीर आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों के संबंध में पुलिस को स्वतंत्र जांच का रास्ता दिया गया।
इस प्रकार अदालत ने स्पष्ट किया कि छात्रों के खिलाफ पहले दर्ज मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, लेकिन ऐसे व्यक्तियों की भूमिका की जांच की जा सकती है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि का दावा किया गया है।
युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अनुच्छेद 142 की व्यापक न्यायिक शक्ति और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा के बीच संतुलन का उदाहरण है। अदालत ने छात्रों को आपराधिक मुकदमों के संभावित दीर्घकालिक प्रभाव से राहत दी, जबकि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले अन्य आरोपित व्यक्तियों के संबंध में कानून के तहत जांच का रास्ता खुला रखा।
हालांकि, 2,873 लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आधार और उनके कथित आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े तथ्य आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में ही निर्धारित होंगे। केवल पुलिस के दावे के आधार पर इन व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
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