राजस्थान HC के एक्टिंग चीफ जस्टिस की सिफारिशों पर SC कॉलेजियम में मंथन, लंबे कार्यकाल ने उठाया अहम सवाल

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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को जस्टिस शर्मा द्वारा सुझाए गए कम से कम चार नामों पर करना है विचार

राजस्थान हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा द्वारा जजों की नियुक्ति के लिए भेजे गए नामों पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम विचार कर रहा है। लंबे कार्यवाहक कार्यकाल और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कॉलेजियम में अलग-अलग राय सामने आई है।

राजस्थान हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के लंबे कार्यकाल ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सामने एक महत्वपूर्ण संस्थागत सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश द्वारा हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई सिफारिशों पर उसी तरह विचार किया जाना चाहिए, जिस तरह स्थायी मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों पर किया जाता है?

जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को जस्टिस शर्मा द्वारा सुझाए गए कम से कम चार नामों पर विचार करना है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं।

एक्टिंग CJ की सिफारिशों पर कॉलेजियम में दो राय

सूत्रों के अनुसार, कॉलेजियम में एक राय यह है कि केवल इस आधार पर किसी सिफारिश को खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि उसे एक एक्टिंग चीफ जस्टिस ने भेजा है। इस दृष्टिकोण के मुताबिक, नामों का मूल्यांकन उनकी योग्यता और मेरिट के आधार पर किया जाना चाहिए।

इस राय को जस्टिस शर्मा के लंबे समय से एक्टिंग चीफ जस्टिस के रूप में कार्यरत होने और राजस्थान हाई कोर्ट से उनके लंबे जुड़ाव से भी बल मिलता है।

दूसरी ओर, कॉलेजियम के भीतर एक चिंता यह भी है कि यदि एक्टिंग चीफ जस्टिस द्वारा की गई नियुक्ति संबंधी सिफारिशों को नियमित रूप से स्वीकार किया जाता है, तो इससे लंबे समय तक कार्यवाहक व्यवस्था बने रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है। इससे स्थायी चीफ जस्टिस की नियुक्ति में जल्दबाजी की आवश्यकता कम हो सकती है।

आम तौर पर एक्टिंग चीफ जस्टिस का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा माना जाता है। ऐसे में उनसे व्यापक न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की अपेक्षा सामान्य स्थिति नहीं मानी जाती। हालांकि, अतीत में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब कॉलेजियम ने परिस्थितियों के आधार पर ऐसी सिफारिशों पर विचार किया।

2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट का उदाहरण

ऐसा ही एक महत्वपूर्ण उदाहरण वर्ष 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट में सामने आया था।

जस्टिस धर्माधिकारी ने 20 फरवरी से 19 मार्च 2020 तक एक्टिंग चीफ जस्टिस के रूप में कार्य किया था। इस दौरान उन्होंने हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए 22 नामों की सूची तैयार की थी। इसके बाद वे 20 मार्च से 27 अप्रैल 2020 तक चीफ जस्टिस रहे और फिर सेवानिवृत्त हो गए।

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उस समय दो कंसल्टेंट जजों—जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़—ने इन सिफारिशों पर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि इतने कम समय में 22 उम्मीदवारों की पर्याप्त जांच करना और प्रत्येक नाम के संबंध में बार से आवश्यक परामर्श लेना व्यावहारिक रूप से कठिन था।

इसके विपरीत, तीसरे कंसल्टेंट जज जस्टिस बीआर गवई ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। उनका मानना था कि जस्टिस धर्माधिकारी वर्ष 2004 से बॉम्बे हाई कोर्ट से जुड़े रहे थे और वहां की बार तथा उम्मीदवारों से पर्याप्त रूप से परिचित थे।

उस समय के CJI एसए बोबडे की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने जस्टिस गवई के सकारात्मक रुख को ध्यान में रखते हुए 22 में से 18 नाम केंद्र सरकार को भेजे। हालांकि, केंद्र ने बाद में कंसल्टेंट जजों की आपत्तियों का हवाला देते हुए नाम वापस कर दिए। इसके बाद मामले को बॉम्बे हाई कोर्ट के पास वापस भेजकर नई सूची तैयार की गई।

राजस्थान हाई कोर्ट में 2022 का उदाहरण

वर्ष 2022 में भी राजस्थान हाई कोर्ट से जुड़ा एक समान प्रश्न सामने आया था।

उस समय के चीफ जस्टिस जस्टिस अकील कुरैशी द्वारा अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में भेजे गए 12 नामों पर केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई थी।

बाद में CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि क्या किसी विशेष उम्मीदवार के खिलाफ कोई ठोस आपत्ति थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कोई विशिष्ट आपत्ति सामने नहीं आई और अंततः केंद्र ने 12 में से 8 नामों को मंजूरी दे दी।

इस उदाहरण से भी स्पष्ट है कि एक्टिंग या कार्यकाल के अंतिम चरण में की गई सिफारिशों को लेकर कोई एक समान दृष्टिकोण नहीं रहा है।

जस्टिस संदीप मेहता के पत्रों से जुड़ा अलग विवाद

जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का लंबा एक्टिंग चीफ जस्टिस कार्यकाल उस समय और अधिक चर्चा में आया जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता, जो पहले राजस्थान हाई कोर्ट के जज रह चुके हैं, ने CJI सूर्यकांत को तीन पत्र लिखे।

2, 10 और 17 अगस्त को लिखे गए इन पत्रों में जस्टिस मेहता ने राजस्थान हाई कोर्ट के प्रशासन से संबंधित गंभीर आरोप लगाए और जस्टिस शर्मा को हटाकर किसी अन्य हाई कोर्ट के स्थायी चीफ जस्टिस को नियुक्त करने का अनुरोध किया।

पत्रों में कथित तौर पर केस लिस्टिंग में हेरफेर, प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग, पक्षपात तथा कुछ मामलों को विशेष तरीके से सूचीबद्ध किए जाने जैसे आरोप लगाए गए।

हालांकि, इन आरोपों को अभी किसी न्यायिक या संस्थागत प्रक्रिया में स्थापित तथ्य नहीं माना गया है।

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CJI सूर्यकांत ने संस्थागत प्रक्रिया पर दिया जोर

CJI सूर्यकांत ने 26 अगस्त को इन शिकायतों के जवाब में स्पष्ट किया कि किसी मौजूदा जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर मीडिया रिपोर्टों या सार्वजनिक दावों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे आरोपों से निपटने के लिए निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए।

इसलिए जस्टिस मेहता द्वारा लगाए गए आरोप और जस्टिस शर्मा द्वारा भेजी गई न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिशें दो अलग-अलग संस्थागत मुद्दे हैं। हालांकि, दोनों घटनाक्रमों के एक ही समय में सामने आने से राजस्थान हाई कोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की भूमिका और कॉलेजियम प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित हुआ है।

लंबे समय तक एक्टिंग CJ रहने का संस्थागत प्रश्न

जस्टिस शर्मा सितंबर 2025 के अंत से राजस्थान हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस के रूप में कार्यरत हैं। लगभग एक वर्ष तक किसी हाई कोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का बने रहना अपने आप में नियुक्ति प्रक्रिया और संस्थागत प्रशासन से जुड़े प्रश्नों को जन्म देता है।

मौजूदा विवाद का व्यापक प्रश्न यही है कि कार्यवाहक व्यवस्था कितनी लंबी हो सकती है और उस दौरान कार्यवाहक चीफ जस्टिस को स्थायी चीफ जस्टिस के समान प्रशासनिक एवं नियुक्ति संबंधी भूमिका किस सीमा तक निभानी चाहिए।

कॉलेजियम के सामने अब जस्टिस शर्मा द्वारा भेजे गए कम से कम चार नामों पर निर्णय लेते समय केवल उम्मीदवारों की व्यक्तिगत योग्यता ही नहीं, बल्कि इस व्यापक संस्थागत प्रश्न पर भी विचार करना होगा।

फिलहाल यह स्पष्ट है कि एक्टिंग चीफ जस्टिस द्वारा की गई सिफारिशों को लेकर कोई स्वतः निषेध लागू नहीं है। अंतिम निर्णय संबंधित उम्मीदवारों की मेरिट, प्रक्रिया की वैधता और उपलब्ध संस्थागत सामग्री के आधार पर लिया जाना है।

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