मौसेरे भाई-बहन की शादी शून्य, फिर भी पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मौसेरे भाई-बहनों के बीच विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शून्य बताया, लेकिन पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार बरकरार रखा। जानिए पूरा फैसला।
🔴 हाई कोर्ट का अहम फैसला: विवाह शून्य घोषित
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मौसेरे भाई-बहनों के बीच हुए विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शून्य (void) घोषित कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा संबंध “निषिद्ध नातेदारी” (prohibited relationship) की श्रेणी में आता है, जिससे इस प्रकार का विवाह कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं कर सकता।
⚖️ फैमिली कोर्ट का आदेश पलटा
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की पीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें स्थानीय सामाजिक प्रथा के आधार पर विवाह को वैध माना गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि केवल प्रथा का हवाला देकर कानून के स्पष्ट प्रावधानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
📜 प्रथा की मान्यता के लिए तय मानदंड
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी सामाजिक या पारंपरिक प्रथा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब वह:
- प्राचीन (ancient) हो
- निरंतर (continuous) रूप से प्रचलित हो
- और सार्वजनिक नीति (public policy) के अनुरूप हो
पीठ ने पाया कि इस मामले में ऐसी कोई ठोस और प्रमाणित प्रथा मौजूद नहीं थी, जो निषिद्ध नातेदारी में विवाह को वैध ठहरा सके।
🧾 मामला: जांजगीर-चांपा का विवाद
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले से जुड़ा है, जहां एक युवक ने 2018 में अपनी मौसेरी बहन से विवाह किया था। कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद पति ने अदालत में याचिका दायर कर विवाह को अवैध घोषित करने की मांग की।
पति का तर्क था कि उसकी मां और पत्नी की मां सगी बहनें हैं, जिससे यह संबंध स्पष्ट रूप से निषिद्ध नातेदारी के अंतर्गत आता है।
🏛️ फैमिली कोर्ट ने प्रथा के आधार पर माना था वैध
फैमिली कोर्ट ने पटेल समाज में प्रचलित कथित “ब्रह्म विवाह” की प्रथा का हवाला देते हुए इस विवाह को वैध माना था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए कहा कि इस प्रकार की प्रथा को समर्थन देने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
⚠️ निषिद्ध नातेदारी में विवाह की अनुमति नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध नातेदारी में विवाह तभी मान्य हो सकता है, जब उसे मान्यता देने वाली प्रथा स्थापित और प्रमाणित हो।
इस मामले में ऐसी कोई वैध प्रथा साबित नहीं हो सकी, इसलिए विवाह को शून्य घोषित करना उचित है।
💰 पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण
हालांकि अदालत ने विवाह को शून्य घोषित किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पत्नी को भरण-पोषण (maintenance) का अधिकार मिलेगा।
यह निर्णय इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि भले ही विवाह कानूनी रूप से अमान्य हो, लेकिन आर्थिक रूप से निर्भर महिला को संरक्षण मिलना चाहिए।
🌐 फैसले का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय व्यक्तिगत कानून और सामाजिक प्रथाओं के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है। अदालत ने संकेत दिया कि परंपराओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन वे कानून और सार्वजनिक नीति के अनुरूप ही होनी चाहिए।
साथ ही, यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका के संवेदनशील दृष्टिकोण को भी दर्शाता है।
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