कोर्ट ने कहा—नई धार्मिक परंपरा शुरू करना अनुच्छेद 25-26 के तहत संरक्षित अधिकार नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल में सार्वजनिक भूमि पर नमाज की अनुमति की मांग खारिज की। कोर्ट ने कहा—नई धार्मिक परंपरा शुरू करना अनुच्छेद 25-26 के तहत संरक्षित अधिकार नहीं।
🔴 नमाज की अनुमति वाली याचिका खारिज
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल जिले के एक गांव में सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने की अनुमति और सुरक्षा देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी धार्मिक गतिविधि, जो पहले से स्थापित परंपरा का हिस्सा नहीं रही हो, उसे संविधान के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता—खासकर तब जब इससे सामाजिक संतुलन बिगड़ने की आशंका हो।
⚖️ अनुच्छेद 25-26 का दायरा सीमित
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है।
अदालत ने रेखांकित किया कि नई धार्मिक व्यवस्था शुरू करना या मौजूदा व्यवस्था का विस्तार करना इन प्रावधानों के तहत स्वतः संरक्षित अधिकार नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब इसका प्रभाव सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ता हो।
📊 राज्य को निवारक कार्रवाई का अधिकार
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी धार्मिक गतिविधि से जनजीवन प्रभावित होने की संभावना हो, तो राज्य सरकार को स्थिति बिगड़ने का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत के अनुसार, प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पहले से ही उचित निवारक कदम उठाने का अधिकार है।
🧾 याचिकाकर्ता का दावा और विवाद
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि वह उपहार विलेख (Gift Deed) के आधार पर विवादित भूमि का मालिक है और उसे वहां नमाज अदा करने से रोका जा रहा है, जो उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हालांकि, राज्य सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में “आबादी भूमि” के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए है और इस पर किसी निजी व्यक्ति का स्वामित्व अधिकार नहीं है।
🕌 स्थापित परंपरा बनाम नई व्यवस्था
राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि उक्त स्थान पर केवल ईद के अवसर पर पारंपरिक रूप से नमाज अदा की जाती रही है और इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
लेकिन याचिकाकर्ता गांव के बाहर से बड़ी संख्या में लोगों को बुलाकर इसे नियमित धार्मिक गतिविधि में बदलने का प्रयास कर रहा था, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
⚠️ सार्वजनिक भूमि पर विशेष अधिकार का दावा खारिज
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि का उपयोग आम जनता के लिए होता है और कोई भी व्यक्ति या समूह इसे स्थायी या विशेष धार्मिक स्थल के रूप में उपयोग करने का दावा नहीं कर सकता।
यह भी कहा गया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दूसरों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।
🌐 “धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं”
हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धर्म का पालन करने का अधिकार असीमित नहीं है। इसका उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए कि इससे अन्य लोगों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और सामान्य जनजीवन बाधित न हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था, आवागमन और शांति बनाए रखना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
📌 फैसले के व्यापक निहितार्थ
यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत का यह रुख भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां नई धार्मिक गतिविधियों और सार्वजनिक हित के बीच टकराव हो।
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