कर्नाटक हाईकोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म करने के मामले में आरोपी की बरी होने की सजा रद्द कर उम्रकैद सुनाई। कोर्ट ने ₹7 लाख जुर्माना, बच्ची के लिए ₹5 लाख एफडी और पीड़िता को अधिकतम मुआवजा देने का निर्देश दिया।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने शादी का वादा कर महिला के साथ यौन संबंध बनाने और बाद में गर्भवती होने पर शादी से इनकार करने के मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने का फैसला पलट दिया है। हाईकोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के अपराध में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध थे और दोनों के बीच यौन संबंध बने थे।
जस्टिस एच. पी. संदेश और जस्टिस बी. प्रमोद की पीठ ने आरोपी पर ₹7 लाख का जुर्माना भी लगाया। इसमें से ₹5 लाख पीड़िता की बेटी के भविष्य के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट में रखने का निर्देश दिया गया। साथ ही, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को पीड़िता और उसकी बेटी की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अधिकतम आर्थिक मुआवजा उपलब्ध कराने को कहा गया।
17 अक्टूबर को दिए गए आदेश में अदालत ने टिप्पणी की कि आरोपी के कृत्य ने पीड़िता का जीवन प्रभावित किया और उसने अपनी बेटी के सामाजिक भविष्य के प्रति भी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। अदालत ने कहा कि सजा निर्धारित करते समय और मुआवजे का आदेश देते समय इन परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता आरोपी को स्कूल के दिनों से जानती थी। आरोपी ने उससे शादी करने का वादा करके शारीरिक संबंध बनाए और इसी आश्वासन पर संबंध जारी रखे। जब महिला गर्भवती हो गई और उसने आरोपी से शादी करने के लिए कहा, तो आरोपी ने कथित तौर पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि शादी की मांग पर आरोपी ने महिला को जान से मारने की धमकी दी और दुपट्टे से उसकी जान लेने की कोशिश की।
महिला ने आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी, दुष्कर्म और आपराधिक धमकी से संबंधित आरोपों में शिकायत दर्ज कराई। मेडिकल जांच में उसकी गर्भावस्था की पुष्टि हुई। DNA जांच से यह भी स्थापित हुआ कि आरोपी ही उसकी बेटी का जैविक पिता है।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने दोनों के बीच संबंधों को सहमति से बना संबंध मानते हुए आरोपी को बरी कर दिया। इसके बाद पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी।
केवल प्रेम संबंध होना आरोपी को बरी करने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की गवाही, शिकायत में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया। निचली अदालत ने इस तथ्य पर अधिक ध्यान दिया कि दोनों के बीच संबंध थे और उनके बीच यौन संबंध बने थे, लेकिन इस महत्वपूर्ण सवाल की पर्याप्त जांच नहीं की कि क्या आरोपी ने शादी के झूठे वादे के आधार पर महिला की सहमति प्राप्त की थी।
पीठ ने कहा कि गवाहों की गवाही से यह सामने आया कि पीड़िता आरोपी के शादी करने के वादे पर विश्वास करती थी और उसे उम्मीद नहीं थी कि आरोपी उसके साथ धोखा करेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि दो लोगों के बीच संबंध होना अपने आप में आरोपी को दुष्कर्म के आरोप से बरी करने का पर्याप्त आधार नहीं है। मामले में यह देखना जरूरी था कि शादी का वादा वास्तविक था या शुरुआत से ही महिला को धोखा देने के उद्देश्य से किया गया था।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि शादी के आश्वासन पर लंबे समय तक यौन संबंध बने रहने के तथ्य को मात्र आपसी सहमति मानकर नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में सहमति की प्रकृति और कथित वादे की वास्तविकता का साक्ष्यों के आधार पर परीक्षण करना आवश्यक है।
DNA रिपोर्ट और पीड़िता की गवाही की अनदेखी पर सवाल
हाईकोर्ट ने DNA रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसमें आरोपी को बच्ची का जैविक पिता बताया गया था। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस साक्ष्य और पीड़िता की गवाही पर पर्याप्त चर्चा नहीं की।
अदालत के अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किए बिना केवल संबंध होने के आधार पर आरोपी को बरी करना उचित नहीं था। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई।
पीड़िता और बेटी को अधिकतम मुआवजा देने का निर्देश
सजा के साथ हाईकोर्ट ने पीड़िता और उसकी बेटी के आर्थिक हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया। अदालत ने आरोपी पर ₹7 लाख का जुर्माना लगाया और ₹5 लाख की राशि बच्ची के नाम फिक्स्ड डिपॉजिट में रखने का निर्देश दिया।
इसके अतिरिक्त, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता और उसकी बेटी की परिस्थितियों का आकलन कर उन्हें अधिकतम संभव मुआवजा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।
अदालत की टिप्पणियां इस बात पर जोर देती हैं कि ऐसे मामलों में न्यायिक मूल्यांकन केवल संबंधों के अस्तित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सहमति, शादी के वादे की प्रकृति, पीड़िता की गवाही, वैज्ञानिक साक्ष्य और पीड़िता तथा बच्चे के पुनर्वास से जुड़े पहलुओं पर भी उचित विचार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला शादी का वादा करके यौन संबंध बनाने से जुड़े मामलों में साक्ष्यों के समुचित मूल्यांकन के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रेम संबंध या पूर्व में बने यौन संबंध अपने आप में आरोपी को दोषमुक्त करने का आधार नहीं हैं। यह निर्धारित करना आवश्यक है कि सहमति स्वतंत्र और वास्तविक थी या कथित झूठे वादे से प्रभावित हुई थी।
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