एक ही मुकदमे में कई उम्रकैद की सजाएं लगातार नहीं चल सकतीं: सुप्रीम कोर्ट ने बदला निचली अदालतों का आदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के उस निर्देश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजाओं को लगातार चलाने का आदेश दिया गया था

सुप्रीम कोर्ट ने राजू शांताराम कोली बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में स्पष्ट किया कि एक ही मुकदमे में अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई कई आजीवन कारावास की सजाएं लगातार नहीं चल सकतीं। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने सजाओं को एक-दूसरे पर अध्यारोपित करने का निर्देश दिया।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि एक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजाओं को एक के बाद एक लगातार नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी सजाएं एक-दूसरे पर अध्यारोपित (superimposed) होंगी। हालांकि, एक सजा में माफी या दंड में छूट मिलने से दूसरी सजा का लाभ स्वतः नहीं मिलेगा।

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने राजू शांताराम कोली बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में यह फैसला सुनाया। 27 अक्टूबर 2026 को दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के उस निर्देश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजाओं को लगातार चलाने का आदेश दिया गया था।

क्या है पूरा मामला?

राजू शांताराम कोली को 12 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। वह 30 अप्रैल 2010 से लगातार हिरासत में था।

सितंबर 2013 में ठाणे के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 376 और 342 के तहत दोषी ठहराया। निचली अदालत ने अलग-अलग अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सजाएं सुनाते हुए उन्हें लगातार चलाने का निर्देश दिया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट Bombay High Court ने 2016 में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद दोषी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और सवाल उठाया कि क्या एक ही आपराधिक मुकदमे में दी गई कई आजीवन कारावास की सजाओं को लगातार चलाने का आदेश कानूनन वैध है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया लगातार सजा चलाने का निर्देश?

पीठ ने कहा कि आजीवन कारावास का अर्थ सामान्यतः दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास है, जब तक सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार सजा में छूट या परिवर्तन न करे। ऐसे में एक ही व्यक्ति को दो या अधिक आजीवन कारावास की सजाएं एक के बाद एक भुगतने का निर्देश देना तार्किक विसंगति पैदा करता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न पर अपने संविधान पीठ के फैसले मुथुरामलिंगम एवं अन्य बनाम राज्य (2016) पर भरोसा किया। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि एक ही मुकदमे में कई आजीवन कारावास की सजाएं दी जा सकती हैं, लेकिन उन्हें लगातार नहीं चलाया जा सकता। ऐसी सजाएं एक-दूसरे पर अध्यारोपित होंगी।

अदालत ने इसी कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने सजाओं के संचालन के संबंध में कानून की सही व्याख्या नहीं की थी।

CrPC की धारा 31 का क्या है महत्व?

मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 31(1) महत्वपूर्ण थी। यह प्रावधान एक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दोषसिद्धि होने पर अलग-अलग सजाएं देने और उनके एक के बाद एक या साथ-साथ चलने के संबंध में अदालत की शक्ति से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 31 की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए कि आजीवन कारावास की कई सजाओं को लगातार चलाने जैसी विसंगति उत्पन्न न हो। इस संदर्भ में अदालत ने माना कि आजीवन कारावास की सजाएं साथ-साथ चलेंगी, जबकि प्रत्येक अपराध के लिए दी गई सजा की स्वतंत्र कानूनी पहचान बनी रहेगी।

यह फैसला इस बात का भी संकेत है कि एक ही मुकदमे में कई सजाओं के संचालन का प्रश्न तय करते समय अपराधों की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

एक सजा में छूट मिलने से दूसरी सजा समाप्त नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कई आजीवन कारावास की सजाओं को अध्यारोपित करने का अर्थ यह नहीं है कि एक अपराध के संबंध में मिली राहत दूसरे अपराध की सजा पर भी स्वतः लागू हो जाएगी।

यदि सक्षम प्राधिकारी किसी एक सजा में remission यानी सजा में छूट या commutation यानी सजा के परिवर्तन का लाभ देता है, तो इससे दूसरी आजीवन कारावास की सजा में अपने आप छूट नहीं मिलती।

इस व्यवस्था का उद्देश्य दो सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रखना है—एक ओर आजीवन कारावास की प्रकृति के कारण सजाओं को लगातार चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग अपराधों के लिए दोषसिद्धि और सजा का स्वतंत्र महत्व बना रहता है।

दोषसिद्धि बरकरार, सजा चलाने के तरीके में संशोधन

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए लगातार आजीवन कारावास भुगतने के निर्देश को निरस्त कर दिया। भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302, IPC 376 और 342 के तहत दोषसिद्धि को इस आधार पर समाप्त नहीं किया गया; संशोधन सजाओं के संचालन के तरीके से संबंधित था।

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अदालत ने हत्या के अपराध के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजा और बलात्कार तथा गलत तरीके से बंधक बनाने से संबंधित अपराधों के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजा को एक-दूसरे पर अध्यारोपित करने का निर्देश दिया।

निर्णय में हिरासत की अवधि के समायोजन से संबंधित CrPC की धारा 428 का भी उल्लेख है। इस प्रावधान के तहत विचाराधीन अवधि का समायोजन लागू कानूनी शर्तों के अनुसार किया जाता है।

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय आजीवन कारावास की कई सजाओं के संचालन के संबंध में स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराता है। अदालतों को सजा सुनाते समय यह ध्यान रखना होगा कि एक ही मुकदमे में अलग-अलग अपराधों के लिए कई आजीवन कारावास की सजाएं दी जा सकती हैं, लेकिन उन्हें लगातार चलाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

साथ ही, सजाओं का अध्यारोपण किसी दोषसिद्धि को निष्प्रभावी नहीं करता और न ही एक अपराध के संबंध में मिली छूट को दूसरे अपराध पर स्वतः लागू करता है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने दंडादेश के संचालन में कानूनी संगति बनाए रखने पर जोर दिया।

केस का नाम: Raju Shantaram Koli v. State of Maharashtra

निर्णय की तारीख: 27 अक्टूबर 2026

पीठ: न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली

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