इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अविवाहित बहन को भी मिलेगा किसान बीमा योजना का ₹5 लाख दुर्घटना मृत्यु लाभ

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कानूनी वारिस के अधिकार पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत अविवाहित बहन का दावा खारिज करने का बीमा कंपनी का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि परिवार के सदस्यों की सूची में बहन का नाम न होना, अपने आप में कानूनी वारिस को दुर्घटना मृत्यु लाभ से वंचित करने का आधार नहीं है।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत किसी अविवाहित बहन को केवल इसलिए व्यक्तिगत दुर्घटना मृत्यु लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि योजना में कवर किए जाने वाले परिवार के सदस्यों की सूची में बहन का अलग से उल्लेख नहीं है। अदालत ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा एक महिला का दावा खारिज करने का निर्णय रद्द करते हुए उसे 5 लाख रुपये का बीमा लाभ देने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने 26 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि यदि मृतक बीमित परिवार का मुखिया या कमाने वाला सदस्य था और दावा करने वाला व्यक्ति नामांकित व्यक्ति या कानूनी वारिस के रूप में भुगतान पाने का हकदार है, तो भुगतान का निर्धारण उस प्राप्तकर्ता पर लागू संबंधित प्रावधान के अनुसार किया जाना चाहिए।

सड़क दुर्घटना में भाई की मौत के बाद खारिज हुआ था दावा

मामला वर्ष 2019 में सड़क दुर्घटना में मारे गए एक व्यक्ति की अविवाहित बहन से जुड़ा है। महिला के अनुसार, उसका भाई परिवार की कृषि भूमि पर खेती करता था और घर का मुखिया तथा मुख्य कमाने वाला सदस्य था। वह अपने भाई पर आर्थिक रूप से निर्भर थी।

महिला ने बताया कि माता-पिता की मृत्यु के बाद उसका सहारा केवल भाई ही था। भाई की मौत के बाद उसने बीमा योजना के तहत निर्धारित राशि के भुगतान के लिए दावा प्रस्तुत किया, लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि योजना से संबंधित समझौता ज्ञापन में बहन को पात्र पारिवारिक सदस्य के रूप में शामिल नहीं किया गया है।

इसके बाद मामला बस्ती की जिला समिति के समक्ष पहुंचा। समिति ने हर्रैया के उपजिलाधिकारी की रिपोर्ट पर विचार किया, जिसमें मृतक को परिवार का मुखिया बताया गया था। समिति ने बीमा कंपनी को दावा स्वीकार कर भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इसके बावजूद कंपनी ने अपना निर्णय नहीं बदला।

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बीमा कंपनी ने परिवार के सदस्यों की सूची का दिया हवाला

हाईकोर्ट में बीमा कंपनी की ओर से दलील दी गई कि उसकी देनदारी योजना की शर्तों और बीमा समझौते से निर्धारित होती है। कंपनी के अनुसार, इसमें पति या पत्नी, अविवाहित बेटी, आश्रित पुत्र और निर्धारित श्रेणी के आश्रित माता-पिता जैसे सदस्यों का उल्लेख था, लेकिन बहन को अलग से शामिल नहीं किया गया था।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह अपने भाई की मृत्यु के बाद परिवार की अकेली जीवित सदस्य रह गई है। केवल बहन होने के आधार पर उसके दावे को खारिज करना उचित नहीं है, जबकि मृतक की बीमा योजना के तहत पात्रता और दुर्घटना में मृत्यु से संबंधित तथ्य स्थापित थे।

कानूनी वारिस के अधिकार पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

खंडपीठ ने कहा कि महिला अपने भाई की मृत्यु के कारण देय बीमा राशि की मांग कर रही थी। वह ऐसा दावा नहीं कर रही थी कि उसे स्वयं बीमित बहन होने के नाते किसी दुर्घटना का लाभ मिलना चाहिए। अदालत के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि बीमित परिवार के मुखिया की दुर्घटना में मृत्यु के बाद भुगतान पाने के लिए कानूनी वारिस की पात्रता को किस तरह देखा जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला को कानूनी वारिस के रूप में भुगतान पाने का अधिकार निर्धारित किया जा सकता है। केवल याचिका में उसे नामांकित व्यक्ति बताए जाने से अलग से नामांकन सिद्ध नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने गौर किया कि कंपनी की आपत्ति से अलग-अलग कानूनी वारिसों के बीच किसी विवाद का पता नहीं चलता। योजना में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता सक्षम न्यायालय से तभी जुड़ी है, जब उत्तराधिकार को लेकर विवाद हो।

बहन का नाम सूची में नहीं होना भुगतान रोकने का पर्याप्त आधार नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार के पात्र सदस्यों की सूची में बहन का नाम न होना अपने आप में उत्तराधिकार संबंधी विवाद पैदा नहीं करता और न ही इससे कानूनी वारिस को भुगतान देने वाले स्पष्ट प्रावधान को निष्प्रभावी किया जा सकता है।

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अदालत के अनुसार, यदि मृतक योजना के तहत बीमित परिवार का मुखिया या कमाने वाला सदस्य था और दावा करने वाला व्यक्ति नामांकित व्यक्ति अथवा कानूनी वारिस के रूप में राशि पाने का हकदार है, तो भुगतान का निर्णय उसी प्राप्तकर्ता पर लागू प्रावधान के आधार पर होना चाहिए।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी द्वारा दावा खारिज करने का निर्णय निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।

बीमा दावों और उत्तराधिकार के मामलों में फैसले का महत्व

यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि बीमा योजना में पारिवारिक सदस्यों की सूची और मृत्यु के बाद बीमा राशि प्राप्त करने के लिए कानूनी वारिस की पात्रता को एक ही प्रश्न नहीं माना जा सकता। किसी व्यक्ति का सूची में अलग से उल्लेख न होना अपने आप में यह तय नहीं करता कि वह मृतक की मृत्यु के बाद देय राशि प्राप्त करने का हकदार नहीं है।

हालांकि, फैसला हर अविवाहित बहन को स्वतः बीमा लाभ का अधिकार नहीं देता। पात्रता का निर्धारण संबंधित योजना की शर्तों, मृतक की बीमित स्थिति और दावेदार के नामांकित व्यक्ति या कानूनी वारिस होने जैसे तथ्यों के आधार पर किया जाएगा।

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