मतदाता सूची विवाद: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश—अपील मंजूर होने पर ही मिलेगा वोट का अधिकार

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मतदाता सूची विवाद: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश—लंबित अपील वाले मतदाताओं को वोट का अधिकार नहीं मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने ECI को निर्देश दिया कि अपील ट्रिब्यूनल द्वारा मंजूर दावों के आधार पर पूरक मतदाता सूची जारी की जाए। लंबित अपील वाले मतदाताओं को वोट का अधिकार नहीं मिलेगा।


पृष्ठभूमि: मतदाता सूची से नाम हटने का विवाद

भारत के Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद में अहम आदेश पारित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, वे केवल तभी मतदान कर सकेंगे जब उनकी अपील ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार कर ली जाए और उनका नाम संशोधित पूरक सूची में शामिल हो।

यह आदेश पहले 13 अप्रैल की सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से व्यक्त किया गया था, जिसे अब विस्तृत लिखित आदेश के रूप में अपलोड किया गया है।


कोर्ट का निर्देश: पूरक मतदाता सूची जारी करने का आदेश

मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने Election Commission of India को निर्देश दिया कि यदि अपीलीय ट्रिब्यूनल 21 या 27 अप्रैल 2026 तक अपीलों का निपटारा कर देते हैं, तो उन आदेशों के आधार पर पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए।

अदालत ने Article 142 of the Constitution of India के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए यह आदेश पारित किया, ताकि पात्र मतदाता अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग कर सकें।


स्पष्टता: लंबित अपील से नहीं मिलेगा मतदान का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल अपील लंबित होने से किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।
अदालत ने कहा कि मतदान का अधिकार तभी मिलेगा जब अपील ट्रिब्यूनल द्वारा अंतिम रूप से मंजूर हो और नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाए।

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यह टिप्पणी उन दावों के संदर्भ में आई, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हटाए जाने की बात कही गई थी।


34 लाख नाम हटने का दावा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से यह जानकारी दी गई कि लगभग 34 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।

इस पर न्यायमूर्ति Justice Joymalya Bagchi ने आश्वासन दिया था कि जिन लोगों के दावे स्वीकार होंगे, उनके नाम चुनाव से पहले सूची में जोड़ दिए जाएंगे।


न्यायिक अधिकारियों की भूमिका और सुरक्षा

अदालत ने SIR प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों के काम की सराहना की और कहा कि उनके द्वारा 60 लाख से अधिक दावों का सत्यापन पूरा किया जा चुका है, जबकि केवल 1,822 आपत्तियां लंबित हैं।

साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार और ECI को निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में कोई कमी न की जाए। पहले दिए गए सुरक्षा आदेशों को जारी रखने और खतरे के आकलन के बिना सुरक्षा न हटाने का निर्देश दिया गया।


संस्थागत व्यवस्था और निगरानी

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्य कर रहे हैं, जिनकी निगरानी तीन न्यायाधीशों की समिति द्वारा की जा रही है।
इसके अलावा, 7 अप्रैल 2026 को जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) और 10 अप्रैल को हुए निरीक्षण का भी उल्लेख किया गया।


आगे की सुनवाई और NIA रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 24 अप्रैल को निर्धारित की है। साथ ही, अदालत ने National Investigation Agency की अंतरिम रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों की भी समीक्षा करने की बात कही है।

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कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस पूरे मामले को “तार्किक निष्कर्ष” तक ले जाना चाहता है।


निष्कर्ष: वोट का अधिकार, लेकिन शर्तों के साथ

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए भी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना जरूरी है।
मतदान का अधिकार सुनिश्चित है, लेकिन केवल उन्हीं के लिए जिनकी पात्रता विधिक प्रक्रिया से सिद्ध हो चुकी हो।


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