कोर्ट ने कहा कि संविदा (Contractual) नौकरी तय अवधि पूरी होने पर स्वतः समाप्त हो जाती
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि संविदा (Contractual) नौकरी तय अवधि पूरी होने पर स्वतः समाप्त हो जाती है। अदालत ने DERC के पूर्व कर्मचारी की सेवा विस्तार रद्द करने को वैध ठहराया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संविदा आधारित नियुक्ति (Contractual Employment) तय अवधि पूरी होने के साथ स्वतः समाप्त हो जाती है और कर्मचारी को सेवा जारी रखने का कोई स्थायी या वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होता।
अदालत ने Delhi Electricity Regulatory Commission (DERC) में कार्यरत एक संविदा कर्मचारी की सेवा विस्तार रद्द किए जाने को वैध ठहराते हुए उसकी अपील खारिज कर दी।
डिवीजन बेंच ने खारिज की अपील
मुख्य न्यायाधीश Devendra Kumar Upadhyaya और न्यायमूर्ति Tejas Karia की खंडपीठ ने उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें कर्मचारी को उसकी संविदा अवधि पूरी होने के बाद सेवा से मुक्त कर दिया गया था।
यह अपील एकल न्यायाधीश द्वारा पारित उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें कर्मचारी की याचिका पहले ही खारिज की जा चुकी थी। विवाद 5 अप्रैल 2024 के कार्यालय आदेश से जुड़ा था, जिसके जरिए पहले दिए गए सेवा विस्तार को निरस्त कर दिया गया और कर्मचारी को कार्यमुक्त कर दिया गया।
2014 से लगातार बढ़ रही थी नियुक्ति
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, अपीलकर्ता की नियुक्ति दिसंबर 2014 में तीन वर्ष के लिए संविदा आधार पर हुई थी। इसके बाद समय-समय पर उसका कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा।
अप्रैल 2021 में उसे फिर से तीन वर्षों के लिए नियुक्त किया गया था, जिसकी अवधि 5 अप्रैल 2024 तक थी। इस अवधि के समाप्त होने से पहले कर्मचारी ने 2027 तक और विस्तार की मांग की थी।
31 जुलाई 2023 को जारी एक कार्यालय आदेश में कथित रूप से उसका कार्यकाल बढ़ा भी दिया गया था। हालांकि बाद में DERC ने एक नया आदेश जारी कर पहले वाले विस्तार को निरस्त कर दिया और संविदा अवधि पूरी होने पर उसे सेवा से मुक्त कर दिया।
कर्मचारी ने लगाया मनमानी का आरोप
अपीलकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि यह मामला केवल संविदा अवधि समाप्त होने का नहीं है, बल्कि पहले से स्वीकृत सेवा विस्तार को मनमाने ढंग से वापस लेने का है।
उसने कहा कि बिना कोई कारण बताए और बिना सुनवाई का अवसर दिए उसका विस्तार रद्द कर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कर्मचारी ने यह भी दलील दी कि 2014 से लगातार मिल रहे विस्तारों के कारण उसके मन में सेवा जारी रहने की “वैध अपेक्षा” (Legitimate Expectation) बन गई थी। इसके समर्थन में उसने सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का हवाला भी दिया।
कोर्ट ने क्यों खारिज किए तर्क?
दिल्ली हाई कोर्ट ने कर्मचारी की सभी दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि उसकी नियुक्ति पूरी तरह संविदात्मक थी और उसका नवीनीकरण केवल DERC के नियमों और प्रदर्शन मूल्यांकन के आधार पर ही संभव था।
अदालत ने पाया कि जिस विस्तार आदेश पर कर्मचारी भरोसा कर रहा था, वह DERC चेयरपर्सन की मंजूरी के बिना जारी किया गया था और इसे जारी करने वाला अधिकारी सक्षम प्राधिकारी नहीं था।
साथ ही अदालत ने कहा कि DERC के मानव संसाधन विनियमों के तहत सेवा विस्तार से पहले प्रदर्शन मूल्यांकन (Performance Appraisal) अनिवार्य था, जो इस मामले में नहीं किया गया।
“कोई वैधानिक अधिकार नहीं”
खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि संविदा कर्मचारी सेवा विस्तार या निरंतरता को अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने टिप्पणी की:
“पूर्व संविदा का अस्तित्व मात्र कर्मचारी को सेवा जारी रखने का अधिकार नहीं देता।”
कोर्ट ने कहा कि 5 अप्रैल 2024 के बाद कोई वैध और लागू संविदा अस्तित्व में ही नहीं थी। इसलिए कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने का प्रश्न नहीं उठता।
सुनवाई और कारण बताने की जरूरत नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवादित कार्यालय आदेश किसी मौजूदा संविदा को समाप्त करने का आदेश नहीं था, बल्कि केवल संविदा अवधि समाप्त होने के कानूनी परिणाम की सूचना थी।
ऐसी स्थिति में न तो कारण बताना आवश्यक था और न ही कर्मचारी को पूर्व सुनवाई का अवसर देना जरूरी था।
अस्वीकृत पद होने का भी पड़ा असर
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि “Executive Assistant” का पद दिल्ली सरकार द्वारा स्वीकृत नियमित पद नहीं था। इसी कारण लंबे समय से कार्यरत संविदा कर्मचारियों को संरक्षण देने वाले पूर्व फैसले इस मामले में लागू नहीं होते।
अंततः अदालत ने एकल न्यायाधीश के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए अपील और लंबित आवेदन खारिज कर दिए।
Tags:
#DelhiHighCourt #DERC #ContractualEmployee #ServiceExtension #EmploymentLaw #LabourLaw #DelhiHC #ContractJob #LegalNews #दिल्लीहाईकोर्ट #संविदानौकरी #DERC #कानूनीखबर #रोजगारकानून #ContractualEmployment
