हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, 13 साल पुरानी याचिकाएं फिर बहाल

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मामला हिंदू धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, राज्य नियंत्रण की सीमा और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक दायरे

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी के हिंदू मंदिर प्रशासन कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं फिर बहाल कर दी हैं। कोर्ट अब राज्य नियंत्रण, ट्रस्ट प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अहम सवालों पर मेरिट में सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू मंदिरों और धार्मिक बंदोबस्तों पर राज्य नियंत्रण से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद को फिर से जीवित कर दिया है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी के मंदिर प्रशासन कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बहाल करते हुए कहा कि अब इन मामलों पर मेरिट के आधार पर सुनवाई की जाएगी।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने अप्रैल 2025 में पारित अपने उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाई कोर्ट जाने की छूट दी गई थी।

मामला Swami Dayananda Saraswathi v. State of Tamil Nadu से जुड़ा है, जिसमें वर्ष 2012 से लंबित कई याचिकाओं के माध्यम से दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में हिंदू धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन संबंधी कानूनों को चुनौती दी गई है।

किन कानूनों को चुनौती?

याचिकाओं में निम्नलिखित कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है—

  • तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959
  • आंध्र प्रदेश चैरिटेबल एंड हिंदू रिलिजियस इंस्टीट्यूशंस एंड एंडोमेंट्स एक्ट, 1987
  • पुडुचेरी हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम, 1972
  • तेलंगाना हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1987

इन कानूनों में मंदिरों के प्रशासन, आय-व्यय के ऑडिट, कार्यकारी अधिकारियों और ट्रस्टियों की नियुक्ति, मंदिर संपत्तियों के उपयोग तथा अधिशेष निधियों के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं का क्या तर्क?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 25, 26 और 31A का उल्लंघन करते हैं।

  • अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्र रूप से मान्यता, पालन और प्रचार का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करता है।
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याचिकाकर्ताओं के अनुसार, राज्य सरकारों द्वारा मंदिर प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित करता है।

अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर विचार करने के बजाय यह कहा था कि विभिन्न राज्यों के कानूनों की संरचना अलग-अलग हो सकती है, इसलिए संबंधित हाई कोर्ट इन चुनौतियों की बेहतर सुनवाई कर सकते हैं।

अदालत ने यह भी कहा था कि हाई कोर्ट सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मामले पर विचार कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ समितियां भी गठित कर सकते हैं।

पुनर्विचार याचिका में क्या दलील दी गई?

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका दाखिल कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का अप्रैल 2025 का आदेश इस गलत धारणा पर आधारित था कि इन कानूनों की संरचना अलग-अलग है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी के कानूनों की जड़ें पुराने मद्रास हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त कानूनों में हैं और इनमें समान प्रकार के प्रावधान मौजूद हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि मामला 13 वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब अलग-अलग हाई कोर्ट भेजने से बहुस्तरीय मुकदमेबाजी और अनावश्यक देरी होगी।

अनुच्छेद 32 का भी दिया हवाला

पुनर्विचार याचिका में यह भी कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जो नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।

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याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर चुका था। जनवरी 2016 और जुलाई 2016 में भी मामले को अंतिम सुनवाई हेतु तय किया गया था।

‘शिरूर मठ’ फैसले का हवाला

याचिकाकर्ताओं ने प्रसिद्ध Shirur Mutt मामले का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि मद्रास हाई कोर्ट ने पुराने HR&CE कानूनों के कई प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बाद के कानूनों में लगभग समान प्रावधान फिर से शामिल कर दिए गए।

अब सुप्रीम कोर्ट करेगा मेरिट में सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अपना पुराना आदेश वापस ले लिया और स्पष्ट किया कि अब मंदिर प्रशासन पर राज्य नियंत्रण की संवैधानिक वैधता पर मेरिट में सुनवाई होगी।

यह मामला हिंदू धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, राज्य नियंत्रण की सीमा और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक दायरे को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन और गुरु कृष्णकुमार ने पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता अक्षय नागराजन और सुविदत्त सुंदरम भी उपस्थित थे।

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