हार्डकोर अपराधों की जांच NIA को सौंपने का सुझाव: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून पर विचार को कहा

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सुप्रीम कोर्ट ने संगठित, पेशेवर और हार्डकोर अपराधों से जुड़े मामलों की जांच NIA को सौंपने का सुझाव दिया है। CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों का ट्रायल NIA स्पेशल कोर्ट में चलने से देरी और विरोधाभासी फैसलों से बचा जा सकेगा।

संगठित और हार्डकोर अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, NIA को सौंपी जा सकती है जांच

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 16 दिसंबर 2025 को संगठित और गंभीर आपराधिक मामलों की जांच प्रणाली को लेकर एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि ऐसे मामले, जो केंद्रीय कानूनों के तहत दर्ज होते हैं और जिनमें “संगठित, पेशेवर और हार्डकोर अपराधी” शामिल होते हैं, उनकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपी जा सकती है। साथ ही, इन मामलों का ट्रायल भी NIA की विशेष अदालतों में चलाया जा सकता है।

हार्डकोर अपराधों की जांच NIA को सौंपने का सुझाव: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून पर विचार को कहा

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने केंद्र सरकार को इस दिशा में कानूनी ढांचा विकसित करने पर विचार करने का सुझाव भी दिया, ताकि मौजूदा व्यवस्था का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके।

अलग-अलग राज्यों में बिखरे केस, एक ही छत के नीचे लाने की जरूरत

मिडिया के एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के गंभीर आपराधिक मामलों में अक्सर एक ही अपराध श्रृंखला से जुड़े कई एफआईआर अलग-अलग राज्यों में दर्ज होती हैं, जिनका ट्रायल अलग-अलग ट्रायल कोर्ट में चलता है। इससे न केवल अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) को लेकर भ्रम पैदा होता है, बल्कि मुकदमों में भारी देरी भी होती है।

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CJI सूर्यकांत ने कहा कि

“एक राज्य में किया गया अपराध दूसरे राज्य को भी प्रभावित कर सकता है। अधिकार क्षेत्र की समस्या खुद में ही एक बड़ा मुद्दा बन जाती है, जिससे आपराधिक ट्रायल में देरी होती है। इसका सीधा फायदा हार्डकोर अपराधियों को मिलता है, जो समाज और देश के हित में नहीं है।”

NIA एक्ट की धारा 6 का हवाला

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाला बागची ने NIA Act की धारा 6 का हवाला देते हुए कहा कि कानून पहले से ही NIA को यह अधिकार देता है कि वह
“भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता या राज्य की सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अपराधों” की जांच राज्यों से अपने हाथ में ले सकती है।

अदालत ने संकेत दिया कि यदि ऐसे मामलों को दिल्ली या अन्य स्थानों पर स्थित विशेष रूप से गठित NIA कोर्ट्स में ट्रांसफर किया जाए, तो जांच और ट्रायल दोनों अधिक सुव्यवस्थित और तेज हो सकते हैं।

एक एजेंसी, एक ट्रायल, कम विरोधाभास

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हार्डकोर और संगठित अपराधों को एक ही सिस्टम के तहत लाने से कई व्यावहारिक फायदे होंगे।

  • एक ही एजेंसी द्वारा जांच
  • एक ही स्पेशल कोर्ट में ट्रायल
  • विरोधाभासी फैसलों की संभावना कम
  • सबूतों के संरक्षण में आसानी
  • और लंबित मामलों का बोझ घटेगा

CJI ने टिप्पणी की कि यदि अलग-अलग राज्यों में दर्ज कई एफआईआर को NIA अपने हाथ में ले ले, तो एकीकृत जांच से न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।

जमानत और ट्रायल में देरी से उठा मुद्दा

यह पूरा मुद्दा दरअसल NIA मामलों में जमानत से जुड़े सवालों के संदर्भ में उठा। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह चिंता रखी गई कि ट्रायल कोर्ट्स पर अत्यधिक बोझ होने के कारण NIA मामलों में ट्रायल लंबे समय तक लंबित रहते हैं, जिससे अभियुक्त जमानत के आधार पर बाहर आ जाते हैं।

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अदालत ने संकेत दिया कि वह पर्याप्त संख्या में विशेष NIA अदालतों के गठन पर भी विचार कर रही है, ताकि गंभीर मामलों का निपटारा समयबद्ध तरीके से हो सके।

नीति और कानून दोनों के लिए संकेत

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी फिलहाल सुझावात्मक (suggestive) है, लेकिन इसे आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़े नीतिगत बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यदि केंद्र सरकार इस पर कानून लाने या मौजूदा कानूनों में संशोधन पर विचार करती है, तो संगठित अपराधों से निपटने की रणनीति में एक नया अध्याय जुड़ सकता है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रभावी अभियोजन और त्वरित न्याय—तीनों के बीच संतुलन साधने की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है।

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