सर्वोच्च अदालत ने केंद्र द्वारा लगाई गई बोर्रोविंग लिमिट्स को चुनौती देने वाले मुकदमे में केरल को अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए मामले को संविधान पीठ को भेजा

Like to Share

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई उधार सीमा Borrowing Limits को चुनौती देने वाले मुकदमे में केरल को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि, इस स्तर पर, सुविधा का संतुलन भारत संघ पर निर्भर है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने मुकदमे को 5-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ को भी भेज दिया।

अदालत ने कहा कि याचिका दायर करने के बाद राज्य को केंद्र से 13608 करोड़ रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ है। प्रथम दृष्टया यह माना जाता है कि एक बार जब कोई राज्य केंद्र से उधार लेता है तो केंद्र द्वारा अगले भुगतान में कमी की जा सकती है। इस मामले में सुविधा का संतुलन केंद्र के पास है। इससे पहले केरल बनाम केंद्र मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य, केंद्र को बैठकर बात करनी चाहिए। वित्त सचिव और वित्त मंत्रालय बैठक कर इन बातों पर चर्चा क्यों नहीं करते। सौहार्दपूर्ण संबंध बड़े पैमाने पर देश के लिए काम करते हैं।

केंद्र पर राज्य की उधार लेने की सीमा कम करने का आरोप लगाया गया है। केरल सरकार ने कहा है कि डीए, पीएफ, पेंशन देने के लिए पैसे नहीं हैं। वहीं केंद्र ने अपनी ओर से पहले एक हलफनामे में राज्य की उधार लेने की क्षमता की सीमा को सही ठहराया था। यहां तक ​​कि सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया था कि सार्वजनिक वित्त प्रबंधन एक राष्ट्रीय मुद्दा है और राज्यों द्वारा अनियंत्रित उधार लेने से देश की क्रेडिट रेटिंग प्रभावित होगी और यह वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

पीठ ने कहा, ”हमें ऐसा लगता है कि मौजूदा मुकदमा संविधान की व्याख्या के संबंध में एक से अधिक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।” न्यायालय ने इसके संबंध में चार प्रश्न तैयार किये।

शीर्ष कोर्ट ने आदेश दिया, “चूंकि संविधान का अनुच्छेद 293 अब तक इस न्यायालय की किसी भी आधिकारिक व्याख्या के अधीन नहीं है। हमारी सुविचारित राय में, उपरोक्त प्रश्न पूरी तरह से संविधान के अनुच्छेद 145 (3) के दायरे में आते हैं। इसलिए हम , इस प्रश्न को 5-न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा संदर्भित करना उचित समझा जाए, जो कि अनुच्छेद 145(3) का आदेश है।”

Must Read -  पति के कर्ज की वसूली के लिए विधवा की FD से काटे ₹19.90 लाख, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SBI को लगाई फटकार

बेंच ने कहा “अंतरिम निषेधाज्ञा के संबंध में, हमने प्रथम दृष्टया मामले के ट्रिपल परीक्षण पर विचार किया। सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति…. प्रथम दृष्टया हम संघ के इस तर्क को स्वीकार करने के इच्छुक हैं कि उधार सीमा का अधिक उपयोग हो रहा है, पिछले वर्ष में, 14वें वित्त आयोग में दिए गए निर्णय को ध्यान में रखते हुए, अगले वर्ष में अधिक उधार लेने की सीमा तक कटौती की अनुमति है। यह वह मामला है जिस पर अंतिम रूप से मुकदमे में निर्णय लिया जाना है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि इसके माध्यम से केरल राज्य को आंशिक रूप से पर्याप्त राहत दी गई है। तदनुसार, न्यायालय ने याचिका का निपटारा कर दिया।

गौरतलब है कि 22 मार्च को खंडपीठ ने अंतरिम याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान, केरल राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया था कि केंद्र की कार्यकारी शक्ति का उपयोग राज्य को बाजार से उधार लेने से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता है और संविधान के तहत ऐसी कोई शक्ति नहीं है। उन्होंने आगे कहा था कि केंद्र राज्य को उधार लेने के लिए बाजार से संपर्क करने से भी रोक रहा है और बाजार सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए राज्य को उधार देने का फैसला करेगा।

अटॉर्नी जनरल (एजी) आर वेंकटरमणि और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन वेंकटरमन भारत संघ की ओर से पेश हुए। एएसजी वेंकटरमन ने तर्क दिया था कि राज्य द्वारा गलत बयान दिए गए हैं। सांख्यिकीय आंकड़ों की ओर इशारा करते हुए, एएसजी ने कहा था कि केरल हाल के दिनों में अत्यधिक उधार ले रहा है। वित्तीय विचारों के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने न्यायालय से अंतरिम राहत पर विचार करते समय राज्य के वित्तीय मापदंडों को ध्यान में रखने का आग्रह किया था।

Must Read -  Advocate General पर आरोपों वाला DSP का हलफनामा ‘पूरी तरह अनुचित’: ओडिशा हाईकोर्ट

इससे पहले, बेंच ने सुझाव दिया था, “एक साथ बैठें और इसे हल करें। सभी वरिष्ठ अधिकारी जो निर्णय लेने में सक्षम हैं और जो पहले से ही निर्णय में शामिल हैं, सभी को एक साथ बैठने दें। हम मामले का उल्लेख करने की स्वतंत्रता देते हैं।”

प्रासंगिक रूप से, इस साल फरवरी में, अटॉर्नी जनरल (एजी) आर. वेंकटरामिनी द्वारा न्यायालय के समक्ष एक विस्तृत नोट दायर किया गया था, जिसमें केंद्र द्वारा कई वित्तीय अनुदानों के बावजूद राज्य द्वारा खराब सार्वजनिक वित्त प्रबंधन को उजागर किया गया था। कई रिपोर्टों और अध्ययनों का हवाला दिया गया और तर्क दिया गया कि राज्य सरकार की केंद्र से अधिक धनराशि की मांग से उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि केरल एक “अत्यधिक ऋणग्रस्त” राज्य है। यह नोट 2023 में राज्य द्वारा दायर एक मुकदमे की प्रतिक्रिया के रूप में दायर किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि केंद्र सरकार अपने स्वयं के वित्त को उधार लेने और विनियमित करने की शक्ति में हस्तक्षेप कर रही है। राज्य के अनुसार, उसकी शक्तियों को विनियमित करने की कार्रवाई से गंभीर वित्तीय संकट पैदा हो जाएगा।

वाद शीर्षक – केरल राज्य बनाम भारत संघ