कोर्ट ने कहा कि हड़ताल से न्याय व्यवस्था और वादियों को नुकसान होता है, गैंगस्टर नहीं रुकते
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने वकील गगनदीप जम्मू पर हमले के विरोध में बार एसोसिएशन की कार्य बहिष्कार घोषणा पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हड़ताल से न्याय व्यवस्था और वादियों को नुकसान होता है, गैंगस्टर नहीं रुकते।
‘काम बंद करने से गैंगस्टर नहीं रुकेंगे’: हाई कोर्ट ने बार हड़ताल पर उठाए सवाल
गगनदीप जम्मू फायरिंग मामले पर स्वतः संज्ञान
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अधिवक्ता गगनदीप जम्मू पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में बार एसोसिएशन द्वारा काम से दूर रहने के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या वकीलों की हड़ताल से गैंगस्टर अपनी आपराधिक गतिविधियां बंद कर देंगे।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ जम्मू से जुड़े फायरिंग मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। गगनदीप जम्मू पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव हैं और हाल ही में उन पर जानलेवा हमला हुआ था।
बार एसोसिएशन ने किया था कार्य बहिष्कार का ऐलान
सुनवाई से पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने एक नोटिस जारी कर कहा था कि अदालत ने अधिकारियों को गगनदीप जम्मू की “जीवन और स्वतंत्रता” की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उनके घर पर स्थायी PCR तैनात करने का निर्देश दिया है।
बार एसोसिएशन ने यह भी कहा कि वह 19 मई 2026 को दर्ज एफआईआर की निष्पक्ष और त्वरित जांच की मांग करेगा। इसके साथ ही जम्मू के समर्थन और हमले के विरोध में लंच के बाद कार्य से दूर रहने की घोषणा की गई।
मुख्य न्यायाधीश ने वादियों की परेशानी का मुद्दा उठाया
सुनवाई के दौरान बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रोहित सूद ने अदालत को बताया कि यह केवल प्रतीकात्मक विरोध था और वकीलों की भावनाओं को दर्शाता है।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश शील नागू ने इस तर्क पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे फैसलों का सीधा असर उन वादियों पर पड़ता है जो दूर-दराज क्षेत्रों से अदालत में न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा:
“क्या आप उस वादी की स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जो 100 या 200 किलोमीटर दूर से सिर्फ इस उम्मीद में आया हो कि आज उसके मामले की सुनवाई होगी?”
उन्होंने आगे तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:
“अगर आप काम से दूर रहेंगे, तो क्या गैंगस्टर काम करना बंद कर देंगे?”
‘हड़ताल करके आप अपने पेशे का अपमान कर रहे हैं’
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अदालत ने मामले को प्राथमिकता देते हुए अपना कर्तव्य निभाया है, लेकिन क्या वकील अपने मुवक्किलों के प्रति अपना दायित्व निभा रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा:
“जब तक आप हड़ताल वापस नहीं लेते, मैं आदेश पर हस्ताक्षर नहीं करूंगा।”
जब बार सदस्यों ने कहा कि अनुपस्थिति केवल लंच के बाद के सत्र तक सीमित थी, तो मुख्य न्यायाधीश ने जवाब दिया:
“हड़ताल करके आप अपने पेशे का अपमान कर रहे हैं।”
पीठ ने आगे कहा कि वकीलों का मूल कर्तव्य अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करना है और अदालत के काम से दूर रहना पेशेवर जिम्मेदारियों के विपरीत है।
कोर्ट ने कहा— एकजुटता दिखाने के और भी तरीके हैं
खंडपीठ ने यह भी कहा कि वकीलों के पास एकजुटता जताने के कई अन्य तरीके मौजूद हैं और न्यायिक कार्य बाधित करना उसका उचित तरीका नहीं है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या गगनदीप जम्मू स्वयं कार्य बहिष्कार का समर्थन करते हैं।
गगनदीप जम्मू बोले— मैंने हड़ताल की मांग नहीं की
अदालत को संबोधित करते हुए गगनदीप जम्मू ने साफ कहा कि उन्होंने कभी भी वकीलों से काम बंद करने की अपील नहीं की थी।
उन्होंने अदालत से कहा:
“मैं पहला व्यक्ति था जिसने कहा कि मैं हड़ताल नहीं चाहता। मैंने कहा था कि मुझे परिणाम चाहिए, हड़ताल नहीं।”
हालांकि, जम्मू ने यह भी कहा कि बाद में बार सदस्यों को लगा कि मामले में पर्याप्त प्रगति नहीं हो रही है, इसलिए अधिक कड़ा कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई।
उन्होंने कहा कि यदि कोई कार्रवाई नहीं होती दिखती, तो बार को एकजुटता दिखानी पड़ती है। फिर भी उन्होंने दोहराया कि अंतिम निर्णय बार एसोसिएशन का था।
वकीलों की सुरक्षा के लिए SOP की मांग
सुनवाई के दौरान बार अध्यक्ष रोहित सूद ने अदालत को बताया कि बार वकीलों पर हमलों को रोकने के लिए मजबूत संस्थागत सुरक्षा चाहता है।
उन्होंने ऐसे मामलों की रोजाना निगरानी और सुनवाई की मांग की। साथ ही वकीलों से जुड़े अपराधों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त करने का सुझाव भी रखा।
सूद ने अदालत से कहा:
“यह समाज को भी संदेश देगा कि वकीलों को इस तरह निशाना नहीं बनाया जा सकता।”
न्यायिक कामकाज बनाम विरोध की बहस तेज
यह मामला अब केवल एक फायरिंग घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वकीलों की सुरक्षा, बार हड़तालों की वैधता और न्यायिक कार्य में व्यवधान जैसे व्यापक मुद्दों को भी सामने ला रहा है।
हाई कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि विरोध और पेशेगत जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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