लखनऊ में अंबेडकर जयंती पर हाईकोर्ट अधिवक्ताओं ने बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी, संविधान के मूल्यों और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।
भारतीय संविधान के शिल्पकार Dr. B. R. Ambedkar की 135वीं जयंती पर लखनऊ में विधि समुदाय ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संविधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। Allahabad High Court Lucknow Bench से जुड़े अधिवक्ताओं ने इस अवसर को केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकल्प दिवस के रूप में मनाया।
🔹 अंबेडकर पार्क में जुटा विधि समुदाय
कार्यक्रम का आयोजन Ambedkar Memorial Park में किया गया, जहां अधिवक्ताओं ने एकत्रित होकर बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।
इस अवसर पर अधिवक्ताओं ने न केवल श्रद्धांजलि दी, बल्कि उनके विचारों और संघर्षों को याद करते हुए उन्हें आज के संदर्भ में प्रासंगिक बताया।
🔹 “भीम जयंती” का ऐतिहासिक महत्व
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए Advocate Amarendra Nath Tripathi महामंत्री उच्च न्यायालय इकाई, अधिवक्ता परिषद, अवध ने कहा कि अंबेडकर जयंती, जिसे “भीम जयंती” भी कहा जाता है, हर वर्ष 14 अप्रैल को मनाई जाती है।
उन्होंने बताया कि:
- डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था
- वे एक महान समाज सुधारक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद् थे
- भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका केंद्रीय और ऐतिहासिक रही
🔹 पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जीवन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रेम चन्द्र राय (प्रांत कोषाध्यक्ष) ने बाबा साहेब के जीवन के शुरुआती दौर पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि:
- डॉ. अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे
- वे संत कबीर के अनुयायी और शिक्षित व्यक्ति थे
- बचपन में ही अंबेडकर ने पारिवारिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया
महज छह वर्ष की आयु में उनकी माता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण परिवार के अन्य सदस्यों ने किया।
🔹 उच्च शिक्षा की ओर सफर
उन्होंने बताया कि 1907 में मैट्रिक पास करने के बाद बाबा साहेब का विवाह हुआ। इसके बाद उन्होंने Elphinstone College से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
उन्हें बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से छात्रवृत्ति प्राप्त हुई, जिसने उनके शैक्षिक जीवन को नई दिशा दी।
स्नातक के बाद उन्हें बड़ौदा राज्य में सेवा देनी पड़ी, लेकिन इसी दौरान उनके जीवन में कई व्यक्तिगत चुनौतियां भी आईं।
🔹 अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और उपलब्धियां
वर्ष 1913 में डॉ. अंबेडकर को उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका भेजा गया, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
उन्होंने:
- Columbia University से एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की
- इसके बाद लंदन जाकर विधि और अर्थशास्त्र की पढ़ाई जारी रखी
लंदन में उन्होंने:
- ग्रेज़ इन से बार-एट-लॉ
- London School of Economics से उच्च अध्ययन
पूरा किया।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में भी अध्ययन किया।
🔹 अधिवक्ता परिषद की भागीदारी
इस आयोजन में अधिवक्ता परिषद, अवध इकाई के कई पदाधिकारी शामिल हुए।
मुख्य रूप से उपस्थित रहे:
- अनिल कुमार पांडेय (प्रांत उपाध्यक्ष)
- प्रेम चन्द्र राय (प्रांत कोषाध्यक्ष)
- दिवाकर सिंह (हाईकोर्ट इकाई अध्यक्ष)
- अमित राय (क्षेत्रीय आयाम प्रमुख)
- राम आसरे वर्मा (उपाध्यक्ष)
- रूपेश कसौधन (मंत्री)
- अशोक यादव और शिव कुमार विश्वकर्मा
इन सभी ने मिलकर बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
🔹 संविधानिक मूल्यों पर जोर
अधिवक्ताओं ने इस अवसर पर कहा कि:
- न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे सिद्धांत
- भारतीय लोकतंत्र की नींव हैं
बाबा साहेब का योगदान इन मूल्यों को संस्थागत रूप देने में निर्णायक रहा है।
अधिवक्ताओं ने यह भी दोहराया कि विधि पेशा केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज में न्याय सुनिश्चित करने का माध्यम है।
🔹 सामाजिक न्याय की प्रेरणा
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि डॉ. अंबेडकर का जीवन:
- संघर्ष
- शिक्षा
- और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण
का प्रतीक है।
उनकी विचारधारा आज भी वंचित और कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने के लिए प्रेरणा देती है।
🔹 सामूहिक संकल्प और श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के अंत में सभी अधिवक्ताओं ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे:
- संविधान की गरिमा बनाए रखेंगे
- न्यायिक व्यवस्था में निष्पक्षता को मजबूत करेंगे
- समाज में समानता और अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करेंगे
🔹 निष्कर्ष
लखनऊ में आयोजित यह कार्यक्रम दर्शाता है कि विधि समुदाय आज भी बाबा साहेब के विचारों को केवल ऐतिहासिक विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के मार्गदर्शक के रूप में देखता है।
अंबेडकर जयंती का यह आयोजन अधिवक्ताओं के लिए एक अवसर बना—जहां उन्होंने अपने पेशे को संविधानिक आदर्शों से जोड़ने का संकल्प दोहराया।
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