बिना कारण बताए रिहाई ठुकराना मनमाना: सुप्रीम कोर्ट ने MHA का आदेश किया रद्द

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SC ने कहा कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर remission से इनकार नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने समयपूर्व रिहाई से इनकार करने वाले गृह मंत्रालय के आदेश को गैर-कारणयुक्त और मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर remission से इनकार नहीं किया जा सकता और सुधार की संभावना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

Supreme Court of India ने समयपूर्व रिहाई (Premature Release) और remission से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले हर प्रशासनिक निर्णय में स्पष्ट कारण दर्ज होना अनिवार्य है।

जस्टिस B.V. Nagarathna और जस्टिस Ujjal Bhuyan की खंडपीठ ने कहा कि बिना कारण बताए remission से इनकार करना “पूर्ण गैर-आवेदन-मन” (complete non-application of mind) को दर्शाता है और ऐसा आदेश संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

क्या था मामला?

मामला Rohit Chaturvedi v. State of Uttarakhand से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता लगभग 22 वर्षों से हत्या के एक मामले में सजा काट रहा था। उसके खिलाफ वर्ष 2003 में Lucknow के महानगर थाने में IPC की धारा 302 के तहत FIR दर्ज हुई थी।

जांच पहले उत्तर प्रदेश पुलिस और CBCID ने की, बाद में मामला Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुकदमे को Dehradun स्थानांतरित किया गया, जहां विशेष अदालत ने वर्ष 2007 में याचिकाकर्ता और सह-आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

remission की मांग और कानूनी लड़ाई

याचिकाकर्ता ने 2022 में समयपूर्व रिहाई के लिए आवेदन किया। बाद में Uttarakhand High Court ने राज्य सरकार को remission याचिका पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।

हालांकि राज्य सरकार ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि मामला CBI जांच से जुड़ा होने के कारण उत्तराखंड Premature Release Policy, 2022 के प्रतिबंधित वर्ग में आता है।

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बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां यह स्पष्ट किया गया कि चूंकि ट्रायल और सजा उत्तराखंड में हुई थी, इसलिए remission पर निर्णय लेने का अधिकार उत्तराखंड सरकार को होगा।

केंद्र सरकार ने क्या किया?

इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने याचिकाकर्ता की समयपूर्व रिहाई की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी, क्योंकि मामला CBI जांच से जुड़ा था और केंद्रीय सहमति आवश्यक थी।

लेकिन Ministry of Home Affairs (MHA) ने 9 जुलाई 2025 को एक संक्षिप्त पत्र जारी कर remission की सिफारिश अस्वीकार कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस आदेश में केवल इतना लिखा गया था कि केंद्र सरकार “सहमति नहीं देती”, लेकिन कोई कारण नहीं बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में प्रशासनिक आदेश reasoned order होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा:

“कारण दर्ज करना मनमानी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा है।”

पीठ ने माना कि गृह मंत्रालय का आदेश पूरी तरह cryptic और non-speaking था तथा उसमें remission policy, कैदी के आचरण या सुधार की संभावना पर कोई चर्चा नहीं की गई।

‘केवल अपराध की गंभीरता आधार नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि remission एक सुधारात्मक (reformative) प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य कैदी के व्यवहार, सुधार और समाज में पुनर्वास की संभावना का आकलन करना होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर remission से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा:

“अपराध की गंभीरता सजा तय करते समय विचाराधीन रहती है। उसके बाद लगातार उसी आधार पर कैद जारी रखना संविधान के सुधारात्मक सिद्धांत के विपरीत होगा।”

सह-आरोपी को मिल चुकी थी राहत

पीठ ने यह भी नोट किया कि मामले के एक सह-आरोपी को पहले ही remission मिल चुका था और उसने याचिकाकर्ता से कम अवधि जेल में बिताई थी।

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इसके अलावा याचिकाकर्ता का जेल रिकॉर्ड संतोषजनक था और उत्तराखंड सरकार स्वयं उसकी रिहाई की सिफारिश कर चुकी थी।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे में समान परिस्थितियों के बावजूद remission से इनकार करना मनमाना और अनुचित है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अदालत ने गृह मंत्रालय के 9 जुलाई 2025 के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को समयपूर्व रिहाई का लाभ देने का निर्देश दिया।

चूंकि याचिकाकर्ता पहले से अंतरिम जमानत पर था, इसलिए कोर्ट ने कहा कि उसे दोबारा आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी।

फैसले का महत्व

यह फैसला remission और समयपूर्व रिहाई से जुड़े मामलों में प्रशासनिक पारदर्शिता और सुधारात्मक न्याय (reformative justice) के सिद्धांत को मजबूत करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है।

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