विरोध के नाम पर हिंसा स्वीकार नहीं: जेपी नड्डा आवास के बाहर पुतला जलाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट सख्त
दिल्ली हाईकोर्ट ने जेपी नड्डा के सरकारी आवास के बाहर पुतला जलाने के मामले में आरोपियों की डिस्चार्ज याचिका खारिज करते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध के नाम पर हिंसा स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने याचिका को “पूरी तरह निरर्थक” बताते हुए ₹25 हजार का जुर्माना लगाया।
Delhi High Court ने लोकतांत्रिक विरोध और हिंसक गतिविधियों की सीमा तय करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा या डर पैदा करने वाली गतिविधियों को लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस Girish Kathpalia ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें आरोपियों ने केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता J. P. Nadda के सरकारी आवास के बाहर पुतला जलाने से जुड़े केस में डिस्चार्ज की मांग की थी।
अदालत ने आरोपियों की याचिका खारिज करते हुए ₹25 हजार की लागत भी लगाई।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार 21 जून 2022 को आरोपी Jagdeep Singh alias Jagga समेत अन्य लोग J. P. Nadda के सरकारी आवास, मोतीलाल नेहरू मार्ग, के बाहर एकत्र हुए थे।
आरोप है कि उन्होंने नारेबाजी की, पुतला जलाया और जलते हुए पुतले को लकड़ी के डंडों के सहारे सुरक्षा कक्ष (गार्ड रूम) और मुख्य गेट की ओर फेंका।
पूरी घटना सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड हुई, जिसे पुलिस ने चार्जशीट का हिस्सा बनाया।
‘सिर्फ विरोध नहीं, खुली अराजकता’
हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज का उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपियों का आचरण केवल विरोध प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना होता, तो आरोपी सड़क, चौड़े फुटपाथ और सर्विस लेन पार कर जलते हुए पुतले के हिस्से सुरक्षा कक्ष की छत और गेट की ओर नहीं फेंकते।
अदालत ने टिप्पणी की:
“यह किसी भी तरह से शांतिपूर्ण विरोध नहीं बल्कि खुली तौर पर विघटनकारी गतिविधि (brazenly disruptive activity) थी।”
हत्या के प्रयास की धारा हटाने से इनकार
आरोपियों ने अदालत में तर्क दिया था कि किसी व्यक्ति को चोट नहीं लगी, इसलिए Indian Penal Code की धारा 307 (हत्या का प्रयास) लागू नहीं होती।
उन्होंने यह भी कहा कि अधिकतम धारा 285 IPC (आग के साथ लापरवाहीपूर्ण आचरण) लागू हो सकती है और धारा 436 IPC लागू नहीं हो सकती क्योंकि विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं हुआ।
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
‘जानलेवा परिणाम की संभावना से इनकार नहीं’
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि चोट न लगना अपने आप में आरोप की गंभीरता कम नहीं करता।
कोर्ट ने माना कि आरोपियों को यह जानकारी अवश्य रही होगी कि सुरक्षा कर्मियों के पास जलता हुआ पुतला फेंकना “इतना खतरनाक” था कि उससे मृत्यु या गंभीर चोट हो सकती थी।
अदालत ने कहा कि इस स्तर पर आरोप तय करने के लिए प्रथमदृष्टया सामग्री पर्याप्त है।
धारा 436 IPC पर भी स्पष्टता
अदालत ने स्पष्ट किया कि Indian Penal Code की धारा 436 केवल विस्फोटक पदार्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि आग के जरिए संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों पर भी लागू होती है।
कोर्ट ने कहा कि आरोपियों का कृत्य लापरवाहीपूर्ण नहीं बल्कि जानबूझकर किया गया प्रतीत होता है, इसलिए धारा 285 IPC का सहारा नहीं लिया जा सकता।
लोकतांत्रिक विरोध पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन “shoot and scoot” यानी हिंसक हरकत कर भाग जाने जैसी गतिविधियों को वैध विरोध नहीं माना जा सकता।
अदालत ने चिंता जताई कि समाज का एक वर्ग विरोध के नाम पर अराजक और हिंसक गतिविधियों में शामिल हो रहा है।
‘पूरी तरह निरर्थक’ याचिका पर जुर्माना
कोर्ट ने आरोपियों की याचिका को “completely frivolous” यानी पूरी तरह निरर्थक करार दिया।
इसके साथ ही अदालत ने ₹25 हजार की लागत लगाने का आदेश दिया, जिसे एक सप्ताह के भीतर Bharat Ke Veer फंड में जमा कराने को कहा गया।
यह ट्रस्ट Ministry of Home Affairs द्वारा संचालित किया जाता है और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के शहीद जवानों के परिवारों की सहायता के लिए कार्य करता है।
फैसले का महत्व
यह निर्णय विरोध प्रदर्शनों की संवैधानिक सीमा और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में हिंसक या खतरनाक गतिविधियों को न्यायालय संरक्षण नहीं देगा।
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