सह-आरोपियों को साथ पैरोल पर रोक नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट ने दी स्पष्टता

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हर मामले में जोखिम और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय होगा

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपियों को एक साथ पैरोल या फरलो देना पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, हर मामले में जोखिम और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय होगा।


पैरोल-फरलो पर महत्वपूर्ण स्पष्टता

Delhi High Court ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सह-आरोपियों (co-accused) को एक साथ पैरोल या फरलो देने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध (absolute prohibition) नहीं है। अदालत ने कहा कि जेल नियमों की कठोर और यांत्रिक व्याख्या (mechanical interpretation) सुधारात्मक न्याय (reformative justice) के उद्देश्य को कमजोर कर देगी।


किस याचिका पर आया फैसला

यह निर्णय दो दोषियों द्वारा दायर याचिकाओं पर दिया गया, जिन्होंने Delhi Prisons Rules, 2018 के नियम 1212 और 1224 की व्याख्या को चुनौती दी थी। इन याचिकाकर्ताओं को केवल इस आधार पर फरलो से वंचित किया गया था कि उनके सह-आरोपियों को पहले ही ऐसी राहत मिल चुकी थी।


सुधारात्मक न्याय और Article 21 से जुड़ा अधिकार

कोर्ट ने कहा कि पैरोल और फरलो की अवधारणा सुधारात्मक न्याय पर आधारित है और यह Article 21 of the Constitution of India के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ी है। ये उपाय कैदियों को परिवार और समाज से जुड़े रहने, मानसिक संतुलन बनाए रखने और समाज में पुनर्वास (reintegration) में मदद करते हैं।


‘Ordinarily’ का मतलब पूर्ण प्रतिबंध नहीं

अदालत ने नियमों में प्रयुक्त शब्द “ordinarily not permissible” की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में सावधानी बरतने की सलाह है। यह शब्द सक्षम प्राधिकारी को विवेक (discretion) का अधिकार देता है।

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यांत्रिक अस्वीकृति पर रोक

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि एक सह-आरोपी को पहले ही पैरोल या फरलो मिल चुकी है, दूसरे को स्वतः वंचित करना कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा। ऐसी “blanket denial” से कैदी वर्षों तक किसी भी राहत से वंचित रह सकते हैं, खासकर जब कई सह-आरोपी हों।


समाज और सुरक्षा का संतुलन जरूरी

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि सह-आरोपियों को एक साथ रिहा करते समय समाज की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का ध्यान रखना जरूरी है। अधिकारियों को यह आकलन करना चाहिए कि क्या इससे गवाहों को खतरा, अपराध की पुनरावृत्ति या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।


शर्तों के साथ मिल सकती है राहत

कोर्ट ने सुझाव दिया कि संभावित जोखिमों को पूरी तरह से राहत से इनकार करने के बजाय उचित शर्तें (conditions) लगाकर नियंत्रित किया जा सकता है। इससे कैदियों के अधिकार और समाज के हित दोनों का संतुलन बना रहेगा।


परिवार के मामलों तक सीमित नहीं नियम

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों में परिवार के सदस्यों को एक साथ राहत देने का उल्लेख केवल उदाहरण (illustrative) है, न कि सीमा (limitation)। अन्य परिस्थितियों में भी, यदि उचित हो, सह-आरोपियों को एक साथ पैरोल या फरलो दी जा सकती है।


नियमों की वैधता बरकरार

कोर्ट ने Delhi Prisons Rules, 2018 की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि ये नियम प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं बल्कि प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए हैं।

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केस-बाय-केस आधार पर निर्णय जरूरी

अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में हर आवेदन का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाए। बिना उचित विचार के आवेदन खारिज करना कानून के उद्देश्य के खिलाफ होगा।


निष्कर्ष

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला पैरोल और फरलो के अधिकारों को लेकर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह सुनिश्चित करता है कि कैदियों के पुनर्वास के अधिकार को बनाए रखते हुए समाज की सुरक्षा से भी समझौता न हो।


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