मातृत्व सुरक्षा का अर्थ केवल महिला कर्मचारी का वेतन और पदनाम बरकरार
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि मातृत्व सुरक्षा केवल वेतन और पद बनाए रखने तक सीमित नहीं है। मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला को समान भूमिका, जिम्मेदारी, अधिकार और प्रमोशन की संभावनाएं भी मिलनी चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने मातृत्व अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मातृत्व सुरक्षा का अर्थ केवल महिला कर्मचारी का वेतन और पदनाम बरकरार रखना नहीं है। मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला कर्मचारी के कर्तव्य, कार्यात्मक स्थिति, रिपोर्टिंग संरचना, अधीनस्थ कर्मचारियों पर निगरानी की जिम्मेदारी और मूल्यांकन एवं प्रमोशन की संभावनाएं भी कानूनी सुरक्षा के दायरे में आती हैं।
जस्टिस सचिन दत्ता ने 31 अगस्त 2026 को दिए फैसले में कहा कि सामान्य परिस्थितियों में मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला को उसी पद पर बहाल किया जाना चाहिए, जिस पर वह अवकाश पर जाने से पहले कार्यरत थी।
यदि वास्तविक और प्रमाणित संगठनात्मक कारणों से वह पद उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता को ऐसा वैकल्पिक पद देना होगा जो वेतन, ग्रेड, स्टेटस, भूमिका, जिम्मेदारियों, प्रबंधकीय अधिकार और करियर में आगे बढ़ने की संभावनाओं के लिहाज से लगभग समान हो।
मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा 12 की व्यापक व्याख्या
हाई कोर्ट ने Maternity Benefit Act, 1961 की धारा 12(1) की व्याख्या करते हुए कहा कि महिला कर्मचारी की वैधानिक रूप से संरक्षित अनुपस्थिति के दौरान उसकी सेवा शर्तों में उसके प्रतिकूल बदलाव नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘conditions of service’ का अर्थ केवल नौकरी समाप्त करने या वेतन में कटौती तक सीमित नहीं है। इसमें कर्मचारी के वास्तविक कार्य, पद का ग्रेड और कार्यात्मक दर्जा, रिपोर्टिंग व्यवस्था, अधीनस्थों की निगरानी की जिम्मेदारी तथा appraisal और promotion के अवसर भी शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा कि केवल समान पदनाम और समान वेतन बनाए रखना पर्याप्त नहीं है, यदि कर्मचारी से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां, अधिकार और करियर के अवसर छीन लिए जाएं।
अदालत के अनुसार, यदि नियोक्ता वेतन और designation तो समान रखे लेकिन कर्मचारी को वास्तविक जिम्मेदारियों और अधिकारों से वंचित कर दे, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से वही काम कर रहा होगा जिसे कानून सीधे तौर पर प्रतिबंधित करता है।
पुराने पद पर वापसी सामान्य नियम
कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला कर्मचारी को उसके पूर्व पद पर बहाल करना सामान्य नियम होना चाहिए।
यदि संगठनात्मक पुनर्गठन या किसी अन्य वास्तविक और प्रमाणित कारण से पुराना पद उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता को समान स्तर का वैकल्पिक पद देना होगा।
ऐसे पद की तुलना केवल वेतन से नहीं होगी। उसमें ये पहलू भी देखे जाएंगे:
- ग्रेड और पद का स्टेटस
- कार्य की प्रकृति
- जिम्मेदारियां
- प्रबंधकीय अधिकार
- रिपोर्टिंग संरचना
- अधीनस्थ कर्मचारियों की निगरानी
- appraisal और promotion की संभावनाएं
नियोक्ता को महिला कर्मचारी के ड्यूटी पर लौटने से पहले यह भी बताना होगा कि उसका पुराना पद क्यों उपलब्ध नहीं है और प्रस्तावित वैकल्पिक पद की जिम्मेदारियां, ग्रेड, वेतन तथा reporting relationship क्या होगी।
यदि कर्मचारी प्रस्तावित व्यवस्था पर आपत्ति करती है, तो नियोक्ता को उस आपत्ति पर विचार कर कारणयुक्त लिखित निर्णय देना होगा।
कर्मचारी की सहमति का मतलब अधिकारों का त्याग नहीं
हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा यह भी दी कि यदि महिला कर्मचारी खुद अपनी ड्यूटी, काम के घंटे, कार्यस्थल, work pattern या वैकल्पिक भूमिका में बदलाव का अनुरोध करती है, तो इसे उसके वैधानिक अधिकारों के त्याग के रूप में नहीं देखा जा सकता।
ऐसी व्यवस्था को बाद में उसके खिलाफ appraisal, increment या promotion में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
निजी कंपनी के खिलाफ Article 226 की याचिका पर भी फैसला
नियोक्ता ने दलील दी थी कि मामला निजी रोजगार संबंध से जुड़ा है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
हाई कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी सामान्य contractual term को लागू कराने की मांग नहीं कर रही थी, बल्कि Maternity Benefit Act की वैधानिक सुरक्षा लागू कराने की मांग कर रही थी।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि अधिनियम की धारा 27 असंगत contractual terms पर overriding effect देती है। इसलिए कोई निजी नियोक्ता केवल यह कहकर वैधानिक दायित्व से बच नहीं सकता कि कर्मचारी और कंपनी के बीच संबंध निजी contractual employment का है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट का मामला
यह फैसला चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट की याचिका पर आया। बिष्ट के पास लगभग 14 वर्षों का पेशेवर अनुभव था और उन्हें 2022 में Manager, Accounting के पद पर नियुक्त किया गया था। उनकी मासिक सैलरी लगभग 2.60 लाख रुपये थी।
उनके अनुसार, उन्होंने मई 2023 में प्रबंधन को अपनी pregnancy की जानकारी दी। इसके बाद उन्हें दूसरी टीम में transfer किया गया। दिसंबर 2023 में उन्होंने maternity leave ली और जुलाई 2024 में काम पर वापस लौटीं।
वापसी पर उन्हें बताया गया कि उनका मूल पद अब उपलब्ध नहीं है और उन्हें Treasury Department में भेज दिया गया है।
बिष्ट ने आरोप लगाया कि नया काम उनकी पिछली managerial accounting responsibilities की तुलना में काफी कम महत्वपूर्ण था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके पास reporting staff नहीं था और उन्हें managerial meetings से बाहर रखा गया।
नियोक्ता ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनका designation, salary, seniority और managerial level बरकरार रहा तथा organisational restructuring के बाद उन्हें investment accounting और currency revaluation से जुड़े कार्य दिए गए।
कंपनी की अपनी दलीलों में मिली विसंगतियां
हाई कोर्ट ने नियोक्ता के pleadings और communications में कुछ महत्वपूर्ण विसंगतियों पर भी गौर किया।
अदालत के समक्ष नियोक्ता की ओर से कहा गया था कि बिष्ट की पिछली भूमिका उनकी अनुपस्थिति के दौरान किसी अन्य कर्मचारी को promotion देकर दे दी गई थी।
रिकॉर्ड में सामने आई एक internal communication में उनके वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ activities केवल “keep her engaged” रखने के उद्देश्य से देने की बात भी सामने आई।
इन परिस्थितियों ने अदालत को कर्मचारी की वास्तविक भूमिका और जिम्मेदारियों में हुए बदलाव की जांच करने के लिए महत्वपूर्ण आधार दिया।
क्रेच सुविधा को लेकर भी हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले में workplace creche facility का मुद्दा भी सामने आया।
बिष्ट ने सितंबर 2024 में नियोक्ता से creche सुविधा के बारे में जानकारी मांगी थी। उन्हें बताया गया कि उस समय सुविधा उपलब्ध नहीं थी। बाद में नियोक्ता ने कहा कि सुविधा मौजूद थी, लेकिन संबंधित दिनों में functional नहीं थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी creche facility जो उस समय काम ही नहीं कर रही हो जब कर्मचारी को उसका इस्तेमाल करना हो, Maternity Benefit Act की धारा 11-A के तहत वैधानिक दायित्व को पूरा नहीं करती।
10 लाख रुपये मुआवजा और 1.5 लाख रुपये लागत
हाई कोर्ट ने respondent no. 2 को बिष्ट को 10 लाख रुपये compensation और 1.5 लाख रुपये costs के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया।
मुआवजे की राशि तय करते समय अदालत ने उनकी पेशेवर स्थिति, लगभग 14 वर्षों के अनुभव और 2.6 लाख रुपये मासिक वेतन को ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि compensation लगभग चार महीने के वेतन के बराबर है।
राशि और costs का भुगतान आठ सप्ताह के भीतर करना होगा। ऐसा नहीं होने पर judgment की तारीख से भुगतान होने तक 9% वार्षिक ब्याज लागू होगा।
केंद्र सरकार को छह महीने में maternity protection framework बनाने का निर्देश
फैसले का सबसे व्यापक हिस्सा निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं पर भी प्रभाव डाल सकता है।
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को Code on Social Security, 2020 की धाराओं 149, 150 और 154 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए maternity protections के प्रभावी implementation के लिए rules, schemes या directions तैयार करने को कहा है।
अदालत ने इसके लिए छह महीने की समयसीमा तय की है।
प्रस्तावित framework में निम्न पहलुओं को शामिल करने की बात कही गई है:
- pregnancy के दौरान workplace accommodation
- maternity leave के बाद role और status की सुरक्षा
- lactation support
- creche की उपलब्धता और functionality की जानकारी
- maternity-related grievances के लिए समयसीमा
- retaliation से सुरक्षा
- शिकायतों की सुनवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी
- urgent मामलों में interim protection
अदालत ने pregnancy-related accommodation requests के लिखित assessment, महिला कर्मचारी को जबरन leave लेने या inferior role स्वीकार करने के लिए मजबूर न करने तथा role या reporting structure में बदलाव के लिए reasoned written decision जैसे safeguards पर भी जोर दिया।
Article 14, 15, 21 और 42 से जुड़ा संवैधानिक संरक्षण
हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 42 तथा maternity legislation को साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि pregnancy और motherhood किसी महिला के लिए professional disadvantage का कारण नहीं बन सकते।
इसलिए मातृत्व के कारण किसी महिला की वास्तविक भूमिका, अधिकार, सम्मान या career progression को कमजोर करना केवल employment decision का विषय नहीं है, बल्कि वैधानिक और संवैधानिक सुरक्षा के दायरे में भी आ सकता है।
फैसले का व्यापक सिद्धांत यह है कि मातृत्व अवकाश के बाद महिला कर्मचारी को केवल उसी वेतन और designation पर लौटाना पर्याप्त नहीं है; उसे वास्तविक रूप से समान professional standing और career opportunity भी मिलनी चाहिए।
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