इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सीनियर सिटीजन एक्ट से नहीं सुलझेंगे संपत्ति स्वामित्व विवाद, ऐसे मामलों के लिए सिविल कोर्ट ही उचित मंच

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हमीरपुर के एक संपत्ति विवाद में स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का उपयोग केवल संपत्ति के स्वामित्व विवाद सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों का निस्तारण सिविल कोर्ट में होगा।


सीनियर सिटीजन एक्ट का दायरा सीमित, संपत्ति स्वामित्व विवाद के लिए सिविल कोर्ट जाएं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act) का उद्देश्य केवल बुजुर्गों के भरण-पोषण, सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित करना है। इस कानून का इस्तेमाल सामान्य संपत्ति स्वामित्व विवादों के समाधान के लिए नहीं किया जा सकता।


हमीरपुर के संपत्ति विवाद पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने हमीरपुर निवासी सतीश चंद्र गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि विवाद केवल संपत्ति के स्वामित्व का है, तो उसका समाधान सिविल कोर्ट में ही किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 23 के दायरे से बाहर आने वाले संपत्ति विवादों की सुनवाई सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल नहीं कर सकता।


क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता का दावा था कि उनके पिता भगवानदास उर्फ गरीबदास के नाम नगर पालिका की आकलन पंजिका में दर्ज मकान संख्या 373 पर उनका कब्जा था।

याचिका के अनुसार, पिता द्वारा 18 अगस्त 2004 को बनाई गई वसीयत के आधार पर निजी पक्षों ने 17 नवंबर 2025 को दो सेल डीड अपने नाम करा लीं। याचिकाकर्ता का आरोप था कि वसीयत फर्जी है और उसके आधार पर की गई बिक्री भी अवैध है।

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ट्रिब्यूनल में सुरक्षा और सेल डीड निरस्त करने की मांग

याचिकाकर्ता ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 22 के तहत डीएम, एसपी और एसडीएम से सुरक्षा प्रदान करने तथा विवादित सेल डीड को निरस्त करने की मांग की थी।

जब इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर पुलिस सुरक्षा, कब्जा संरक्षण, सेल डीड को फर्जी घोषित करने और राज्य स्तरीय समिति के हस्तक्षेप की मांग की।


हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

खंडपीठ ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अध्याय-5 में संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान अवश्य है, लेकिन इसे अधिनियम के मूल उद्देश्य के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 23 के तहत कार्रवाई तभी संभव है जब किसी वरिष्ठ नागरिक ने अपनी संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित की हो कि बदले में उसकी देखभाल की जाएगी और बाद में उस शर्त का पालन न किया गया हो।

यदि विवाद केवल संपत्ति के स्वामित्व या वैधता का है, तो उसका निर्णय सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल नहीं बल्कि सिविल कोर्ट करेगा।


‘Expressio Unius Est Exclusio Alterius’ सिद्धांत का उल्लेख

फैसले में हाई कोर्ट ने विधिक सिद्धांत “Expressio Unius Est Exclusio Alterius” का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी कानून में किसी विशेष परिस्थिति का स्पष्ट उल्लेख किया गया हो, तो उससे बाहर की परिस्थितियां स्वतः उस कानून के दायरे में नहीं आतीं।

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इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि सामान्य स्वामित्व विवादों का निस्तारण वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत नहीं किया जा सकता।


फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का उद्देश्य संपत्ति के हर प्रकार के विवाद का निपटारा करना नहीं है। यदि मामला केवल स्वामित्व, वसीयत की वैधता या सेल डीड की वैधता से जुड़ा है, तो संबंधित पक्षों को सिविल कोर्ट का ही दरवाजा खटखटाना होगा।


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