नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित; BNSS की धाराओं 126 और 130 पर हुई बहस

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अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अदालत की टिप्पणी

AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की दिल्ली पुलिस के शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 के पर्सनल बॉन्ड और जमानतदार संबंधी नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद शुक्रवार शाम 6 बजे आदेश सुनाएंगे। सुनवाई में BNSS की धाराओं 126, 130 और 136 तथा अनुच्छेद 21 पर बहस हुई।

दिल्ली हाईकोर्ट ने लेफ्ट छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। नेहा ने दिल्ली पुलिस की ओर से शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने संबंधी नोटिस को चुनौती दी है। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दोनों पक्षों की ढाई घंटे से अधिक समय तक दलीलें सुनने के बाद कहा कि फैसला शुक्रवार शाम 6 बजे सुनाया जाएगा।

यह मामला 16 अक्टूबर को आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन के बाद शुरू हुई कार्रवाई से जुड़ा है। नेहा बोरा ने अदालत से पुलिस के नोटिस और उसके आधार पर की जाने वाली कार्रवाई को रद्द करने तथा संबंधित अधिकारियों को उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का निर्देश देने की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 16 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के बाद शांति बनाए रखने के लिए नेहा बोरा को बॉन्ड भरने संबंधी नोटिस जारी किया। यह नोटिस 17 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी किया गया था।

नोटिस में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 130 का उल्लेख किया गया। मामले में धारा 135(3) का भी संदर्भ आया। नेहा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने नोटिस की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

नेहा बोरा का कहना है कि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उन्होंने किसी प्रकार की हिंसा का आह्वान नहीं किया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि वह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के एक अलग विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थीं।

‘लोकतंत्र में रिजीम चेंज का आह्वान करना गलत नहीं’

सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का आह्वान करना अपने आप में गलत नहीं है।

उन्होंने दलील दी कि नेहा ने 16 अक्टूबर को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया था और हिंसा के लिए कोई अपील नहीं की थी। उनके अनुसार, जब नेहा शाम को मंडी हाउस पहुंचीं, तो उन्हें 10 से 15 मिनट के भीतर हिरासत में ले लिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय नेहा पर शांति भंग करने का कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

वकील ने तर्क दिया कि नेहा को हिरासत में लेना गैरकानूनी था और हिरासत के बाद उन्हें तत्काल अपने परिवार या वकीलों से बात करने की अनुमति नहीं दी गई।

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जिस इलाके से नेहा को हिरासत में लिया गया, वहां BNSS की धारा 163 लागू होने के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं थी, जबकि लाउडस्पीकर के माध्यम से इसके लागू होने की घोषणा किए जाने का दावा किया गया।

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‘कारण बताओ नोटिस से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी’

नेहा के वकील ने अदालत में कहा कि पुलिस की कार्रवाई प्रक्रियात्मक रूप से दोषपूर्ण थी। उनके अनुसार, शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड की आवश्यकता निर्धारित करने से पहले संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध उपलब्ध जानकारी की प्रारंभिक जांच होनी चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि नोटिस यांत्रिक तरीके से जारी किया गया और BNSS की धारा 136 के तहत सुरक्षा देने का आदेश पारित करने से संबंधित कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि केवल किसी प्रदर्शन में भाग लेने या सरकार के विरोध में नारे लगाने के आधार पर शांति भंग होने की आशंका मान लेना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने पुलिस की जानकारी की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल

दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलीलें शुरू कीं, तो अदालत ने पूछा कि क्या मजिस्ट्रेट के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी व्यक्ति के विरुद्ध मिली जानकारी की विश्वसनीयता को लेकर स्वयं संतुष्ट हो।

पीठ ने उदाहरण देते हुए सवाल किया कि यदि मजिस्ट्रेट को बताया जाए कि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर नारे लगा रहा था और इसी आधार पर BNSS की धारा 126 के तहत कार्यवाही शुरू की जाए, तो क्या मजिस्ट्रेट को यह जांचना जरूरी नहीं है कि संबंधित जानकारी भरोसेमंद है या नहीं।

अदालत ने यह भी पूछा कि प्रारंभिक जांच और कारण बताओ नोटिस पर सुनवाई के दौरान क्या संबंधित व्यक्ति को अपना बचाव करने के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए जाते हैं।

एएसजी चेतन शर्मा ने जवाब में कहा कि धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट को मिली जानकारी के आधार पर संतुष्ट होने की पर्याप्त गुंजाइश है और इस चरण पर प्रत्येक तथ्य को नियमित मुकदमे की तरह प्रमाणित करना आवश्यक नहीं है।

अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रक्रिया की निष्पक्षता के महत्व पर भी जोर दिया।

अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की कार्रवाई की जाती है, विशेषकर निवारक प्रकृति की कार्यवाही में, तो कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।

पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही सीमित किया जा सकता है।

अदालत की टिप्पणियां इस प्रश्न से जुड़ी थीं कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड की कार्यवाही शुरू करते समय संबंधित व्यक्ति के अधिकारों और वैधानिक प्रक्रिया के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए।

‘नेहा बोरा ने एक के बाद एक 12 उल्लंघन किए’: एएसजी

दिल्ली पुलिस की ओर से एएसजी चेतन शर्मा ने दलील दी कि नेहा बोरा ने कथित तौर पर एक के बाद एक 12 उल्लंघन किए हैं और मजिस्ट्रेट ने इसी आधार पर जांच शुरू की है।

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उन्होंने कहा कि शांति भंग होने की आशंका से संबंधित कार्यवाही में BNSS की धाराएं 126 और 130 को साथ पढ़ा जाना चाहिए।

एएसजी ने नेहा बोरा के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए कथित बयानों का भी उल्लेख किया, जिनमें सत्ता परिवर्तन और दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियों को लेकर टिप्पणी की गई थी।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नेहा का खुद को दूसरे संगठन के प्रदर्शन से अलग बताना सही नहीं है। पुलिस के अनुसार, संबंधित क्षेत्र में धारा 163 लागू थी और बैरिकेडिंग भी की गई थी। एएसजी ने कहा कि पुलिस बल की संख्या कम होने के कारण नेहा के सीपी की ओर जाने की बात भी सामने आई।

‘मुझे पहले ही बुरी लड़की साबित कर दिया गया’: अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता की उस चिंता का उल्लेख किया, जिसके अनुसार उन्हें पहले ही गलत या अनुचित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा चुका है।

अदालत ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति पर लगने वाला सामाजिक कलंक और उसके आधार पर की जाने वाली कार्रवाई भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में विचारणीय पहलू हो सकते हैं।

हालांकि, यह टिप्पणी अंतिम निर्णय नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

अब शुक्रवार शाम 6 बजे सुनाया जाएगा फैसला

सभी दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत शुक्रवार शाम 6 बजे अपना आदेश सुनाएगी।

फैसले में यह स्पष्ट हो सकता है कि नेहा बोरा को जारी किया गया नोटिस वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप था या नहीं और क्या उसके खिलाफ की गई कार्रवाई में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया।

कानूनी महत्व: यह मामला BNSS के तहत शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड संबंधी कार्यवाही, मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के आधार और अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से जुड़े प्रश्न उठाता है। अंतिम कानूनी स्थिति हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी।

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