जस्टिस अजय भनोट की अदालत के बहिष्कार को लेकर वकीलों के प्रदर्शन के दौरान हंगामे और फर्नीचर फेंके जाने की खबर, अवमानना कार्रवाई की तैयारी

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकीलों के प्रदर्शन के दौरान हंगामा

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अजय भनोट की अदालत के बहिष्कार को लेकर वकीलों के प्रदर्शन के दौरान हंगामे और फर्नीचर फेंके जाने की खबर है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने CCTV फुटेज मंगाकर शामिल लोगों की पहचान और अवमानना कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट में बुधवार को वकीलों के प्रदर्शन के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई। रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अजय भनोट की अदालत के भीतर फर्नीचर फेंके जाने और हंगामे की घटना सामने आई। यह विरोध इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की उस अपील के बाद हुआ, जिसमें न्यायमूर्ति भनोट की अदालत का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया था। एसोसिएशन ने आरोप लगाया था कि न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता के साथ अनुचित व्यवहार किया।

घटना पर संज्ञान लेते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अदालत परिसर में कुछ वकीलों द्वारा किए गए हंगामे को “अवमाननापूर्ण” करार दिया। उन्होंने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को CCTV फुटेज प्राप्त करने और घटना में शामिल लोगों की पहचान करने का निर्देश दिया, ताकि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सके।

अदालत में हंगामे और तोड़फोड़ पर गंभीर सवाल

घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता पारस नाथ सिंह ने कहा कि अदालत के भीतर तोड़फोड़ करना और न्यायाधीश के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है। उनके अनुसार, वकीलों की शिकायतें चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें शारीरिक या मौखिक हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ऐसा आचरण प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना के दायरे में आ सकता है। उन्होंने बार और बेंच के बीच पारस्परिक सम्मान को न्यायिक व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक बताया।

संवैधानिक अदालतों में इस तरह की तोड़फोड़ की घटनाएं असामान्य मानी जाती हैं। ऐसे मामलों में अदालत की गरिमा, न्यायिक कार्यवाही की स्वतंत्रता और बार-बेंच संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

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क्या है विवाद की वजह?

बार एसोसिएशन के आरोपों के अनुसार, विवाद उस समय शुरू हुआ जब अदालत कक्ष में पुलिस अधिकारियों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बैठने के लिए अलग कुर्सी की व्यवस्था की जा रही थी। इसी दौरान एक पुलिस अधीक्षक (SP) कथित तौर पर उस पंक्ति में बैठ गए, जिसे सामान्यतः अधिवक्ताओं के बैठने के लिए आरक्षित माना जाता है।

बताया गया कि एक वकील ने पुलिस अधिकारी से पीछे की ओर बैठने का अनुरोध किया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ और मामला न्यायाधीश के सामने पहुंच गया।

बार एसोसिएशन का आरोप है कि न्यायमूर्ति अजय भनोट ने संबंधित वकील को पुलिस अधिकारी से माफी मांगने के लिए कहा। एसोसिएशन ने यह भी दावा किया कि न्यायाधीश ने वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव पर टिप्पणी की और उनका उपहास किया।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विवरण से नहीं होती है। इन्हें फिलहाल बार एसोसिएशन की ओर से लगाए गए आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की मांग की

27 अक्टूबर को जारी एक पत्र में बार एसोसिएशन ने पूरे घटनाक्रम पर गंभीर आपत्ति जताई। पत्र में आरोप लगाया गया कि न्यायाधीश ने संबंधित वकील को जेल भेजने की धमकी दी। एसोसिएशन के अनुसार, जब वकील ने माफी मांगने की कोशिश की, तो उसे पुलिस अधिकारी से भी माफी मांगने के लिए कहा गया।

पत्र में यह भी दावा किया गया कि एक सरकारी अधिवक्ता ने संबंधित वकील को फटकार लगाई और फिर न्यायाधीश से शिकायत की। इसके बाद न्यायाधीश ने कथित तौर पर वकील की ओर उंगली उठाते हुए उसे जेल भेजने का आदेश दिया।

बार एसोसिएशन ने रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर मामले में हस्तक्षेप करने और आरोपों पर संज्ञान लेने का अनुरोध किया। एसोसिएशन ने चेतावनी दी थी कि यदि मामले में कार्रवाई नहीं की गई, तो उसके सदस्य जस्टिस अजय भनोट की अदालत का बहिष्कार करेंगे।

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अवमानना कार्यवाही में CCTV फुटेज की भूमिका अहम

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल द्वारा CCTV फुटेज मंगाने और संबंधित लोगों की पहचान करने का निर्देश इस मामले में महत्वपूर्ण है। फुटेज से अदालत परिसर में हुई घटनाओं के क्रम और उसमें शामिल व्यक्तियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश को किसी व्यक्ति के दोषी ठहराए जाने के समान नहीं माना जा सकता। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आचरण का निर्धारण लागू कानून तथा न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार किया जाना होगा।

बार और बेंच के बीच सम्मान बनाए रखना जरूरी

यह घटनाक्रम न्यायपालिका और अधिवक्ता समुदाय के बीच संस्थागत संबंधों की संवेदनशीलता को सामने लाता है। वकीलों को न्यायिक कार्यवाही के दौरान अनुचित व्यवहार के खिलाफ अपनी शिकायतें उठाने का अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका अदालत की गरिमा और कानून के अनुरूप होना चाहिए।

दूसरी ओर, न्यायिक अधिकारियों के आचरण को लेकर उठाई गई शिकायतों पर भी उचित संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से विचार किया जाना महत्वपूर्ण है। अब मामले में CCTV फुटेज और आगे होने वाली न्यायिक कार्रवाई से घटनाक्रम के तथ्यों पर अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है।

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