मेरठ ‘ब्लू ड्रम’ हत्याकांड: मुस्कान और साहिल ने फांसी की सजा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में दी चुनौती

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जिला अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा

मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में मृत्युदंड पाए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर कर दोषसिद्धि और फांसी की सजा रद्द करने की मांग की है। अभियुक्तों ने साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

मेरठ/प्रयागराज | कानूनी समाचार

उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड, जिसे ‘ब्लू ड्रम केस’ के नाम से जाना गया, में नया कानूनी मोड़ सामने आया है। हत्या के मामले में मृत्युदंड पाए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने जिला अदालत के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है। दोनों ने संयुक्त अपील दाखिल कर अपनी दोषसिद्धि और मृत्युदंड का आदेश रद्द करने तथा सभी आरोपों से बरी किए जाने की मांग की है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अपील में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और जांच के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। मामला अगले सप्ताह हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आ सकता है। हालांकि, सुनवाई की तारीख और सूचीबद्धता की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

जिला अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा

मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर 2026 को अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाते हुए अपराध को ‘विरलतम से विरल’ यानी Rarest of Rare श्रेणी का मामला माना था।

अदालत ने दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। सौरभ राजपूत की हत्या के अलावा साक्ष्य नष्ट करने से संबंधित अपराध में भी दोनों को सजा सुनाई गई थी।

अब अभियुक्तों ने हाईकोर्ट से दोषसिद्धि और सजा के आदेशों को निरस्त करने की अपील की है। अपील दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि निचली अदालत का फैसला रद्द हो गया है। दोषसिद्धि और मृत्युदंड पर अंतिम निर्णय हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद ही होगा।

क्या है पूरा ‘ब्लू ड्रम’ हत्याकांड?

यह मामला मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके का है। अभियोजन के आरोपों के अनुसार, सौरभ राजपूत की हत्या के बाद उसके शव को ठिकाने लगाने के उद्देश्य से नीले प्लास्टिक के ड्रम में रखा गया था। आरोप है कि शव को छिपाने के लिए ड्रम में सीमेंट और कंक्रीट भी भरा गया।

मामले के सामने आने के बाद इसने व्यापक जन-ध्यान आकर्षित किया। पुलिस ने जांच के बाद मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को गिरफ्तार किया और बाद में मेरठ की अदालत में मुकदमा चला।

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किन धाराओं में हुई थी दोषसिद्धि?

ट्रायल कोर्ट ने दोनों अभियुक्तों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1), धारा 3(5) के साथ पढ़ते हुए हत्या के अपराध में दोषी ठहराया। इसके अतिरिक्त, साक्ष्य नष्ट करने से संबंधित धारा 238(a) के तहत भी दोषसिद्धि की गई।

हाईकोर्ट में दायर अपील में दोनों ने इन धाराओं के तहत हुई दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए सभी आरोपों से बरी किए जाने की मांग की है।

अपील में क्या-क्या दलीलें दी गईं?

अभियुक्तों की अपील का प्रमुख तर्क है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। उनका कहना है कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों का उचित मूल्यांकन किए बिना दोषसिद्धि का फैसला सुनाया।

अपील में मुख्य रूप से निम्नलिखित आपत्तियां उठाई गई हैं:

1. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पर्याप्तता पर सवाल

अपीलकर्ताओं का दावा है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं करती। उनका तर्क है कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समग्र और विधिसम्मत विश्लेषण नहीं किया।

2. हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद से जुड़े बयानों में विरोधाभास

अपील में आरोप लगाया गया है कि हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद के संबंध में गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं। अभियुक्तों ने यह भी कहा है कि इन खरीद से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और वैध रसीदें अदालत में पेश नहीं की गईं।

3. बरामदगी के दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर का मुद्दा

अपीलकर्ताओं ने बरामदगी से संबंधित दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर न होने का मुद्दा भी उठाया है। उनका दावा है कि इससे जांच और बरामदगी की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

4. वीडियोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आपत्ति

अपील में वीडियोग्राफी की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र उपलब्ध न होने की दलील दी गई है। अभियुक्तों के अनुसार, इन प्रक्रियागत कमियों का असर साक्ष्यों की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।

ये सभी दलीलें अपीलकर्ताओं की ओर से पेश की गई हैं। इनकी सत्यता, कानूनी प्रासंगिकता और दोषसिद्धि पर संभावित प्रभाव का निर्धारण हाईकोर्ट करेगा।

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हाईकोर्ट से दोषसिद्धि और मृत्युदंड रद्द करने की मांग

अपील में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने 30 सितंबर 2026 के दोषसिद्धि आदेश तथा 14 अक्टूबर 2026 को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने सभी आरोपों से बरी किए जाने का अनुरोध भी किया है।

अपील में वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला तथा अधिवक्ता निधि त्रिवेदी, रवितेंद्र प्रताप सिंह चंदेल और संदीप कुमार दुबे के नाम शामिल बताए गए हैं।

कानूनी महत्व: परिस्थितिजन्य साक्ष्य और मृत्युदंड की न्यायिक समीक्षा

इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए आवश्यक कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में अदालत को साक्ष्यों की समग्र श्रृंखला, प्रत्येक परिस्थिति की विश्वसनीयता और आरोपी के अपराध की ओर संकेत करने वाले निष्कर्षों का मूल्यांकन करना होता है।

इसके साथ ही मृत्युदंड के मामले में सजा से संबंधित कानूनी मानकों की समीक्षा भी महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, अपील में उठाई गई किसी भी आपत्ति को अपने आप दोषसिद्धि रद्द करने का आधार नहीं माना जा सकता; उसका प्रभाव रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और लागू कानून के संदर्भ में तय होगा।

निष्कर्ष: मेरठ के बहुचर्चित ‘ब्लू ड्रम’ हत्याकांड में अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने दोषसिद्धि और मृत्युदंड को चुनौती देने वाली अपील है। अभियुक्तों ने साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया में कथित खामियों का हवाला दिया है। इन दलीलों पर अदालत का निर्णय आगे की न्यायिक कार्यवाही में सामने आएगा।

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