केरल हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन पर रोक लगाने से किया इनकार, नए बोर्ड ने संभाला कार्यभार

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वक्फ कानून की किन धाराओं पर विवाद

केरल हाईकोर्ट ने राज्य वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि नया बोर्ड कार्यभार संभाल चुका है। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी।

केरल | कानूनी समाचार

केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को केरल राज्य वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से नियुक्त नया बोर्ड पहले ही कार्यभार संभाल चुका है। हालांकि, अदालत ने पुनर्गठन से जुड़े कानूनी सवालों पर सुनवाई जारी रखते हुए अपीलकर्ताओं को नवनियुक्त बोर्ड के सदस्यों को नोटिस देने का निर्देश दिया है। मामले को आगे की सुनवाई के लिए 29 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया है।

जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की खंडपीठ उन अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें एकल पीठ के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें वक्फ बोर्ड के नए सदस्यों के नामांकन संबंधी सरकारी अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार किया गया था।

नया बोर्ड कार्यभार संभाल चुका है: हाईकोर्ट

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से अंतरिम राहत की मांग की गई। इस पर जस्टिस देवन रामचंद्रन ने कहा कि अदालत अनुरोध स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि महाधिवक्ता ने सूचित किया है कि विवादित अधिसूचना लागू हो चुकी है और नए वक्फ बोर्ड ने अपना कार्यभार संभाल लिया है।

अदालत ने अपीलकर्ताओं को नवनियुक्त बोर्ड सदस्यों को नोटिस देने का निर्देश दिया। इस तरह फिलहाल पुनर्गठन पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की गई, लेकिन विवाद के मूल कानूनी प्रश्नों पर सुनवाई का रास्ता खुला हुआ है।

सिंगल बेंच ने क्या कहा था?

इससे पहले, एकल न्यायाधीश ने प्रथम दृष्टया माना था कि राज्य सरकार का निर्णय वक्फ बोर्ड की संरचना से संबंधित पूर्ववर्ती खंडपीठ के आदेशों के विपरीत नहीं दिखाई देता।

एकल पीठ ने दोनों याचिकाओं को संबंधित याचिकाओं के साथ व्यापक कानूनी प्रश्नों पर विचार के लिए खंडपीठ के समक्ष भेज दिया था। इस आदेश को वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष के.एस. हमजा और पूर्व सदस्य सी.के. उस्मान हाजी ने चुनौती दी है।

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क्या खंडपीठ ने सरकार को पुनर्गठन का निर्देश दिया था?

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वक्फ बोर्ड की संरचना से संबंधित जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही अदालत ने सरकार को बोर्ड के पुनर्गठन का स्पष्ट निर्देश दिया था।

राज्य के महाधिवक्ता जाजू बाबू ने दलील दी कि सरकार ने प्रस्तावित पुनर्गठन के बारे में खंडपीठ को पहले ही सूचित कर दिया था।

इस पर जस्टिस रामचंद्रन ने टिप्पणी की कि खंडपीठ ने अपने आदेश में केवल सरकार के बयान को दर्ज किया था, न कि पुनर्गठन का स्पष्ट निर्देश दिया था। अदालत के अनुसार, सरकार के बयान को दर्ज करने का अर्थ यह था कि खंडपीठ को पुनर्गठन पर विचार किए जाने की जानकारी दी गई थी।

यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान विवाद में यह जांचना होगा कि सरकार की कार्रवाई पूर्ववर्ती न्यायिक आदेशों के अनुरूप थी या नहीं और क्या पुनर्गठन के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया।

विवाद की मुख्य वजह: पांच साल के कार्यकाल से पहले सदस्यों को हटाने का आरोप

यह विवाद उन जनहित याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें केरल राज्य वक्फ बोर्ड की संरचना को चुनौती दी गई है। पूर्व में खंडपीठ ने राज्य सरकार से कानून के अनुसार बोर्ड में रिक्त पदों को भरने के लिए कहा था। इसके बाद सरकार ने बोर्ड का पुनर्गठन किया।

पूर्व अध्यक्ष के.एस. हमजा और पूर्व सदस्य सी.के. उस्मान हाजी का आरोप है कि सरकार ने मौजूदा सदस्यों को उनके वैधानिक पांच वर्ष के कार्यकाल के केवल आठ महीने बाद ही हटा दिया। अपीलकर्ताओं का कहना है कि सदस्यों को हटाने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

उनका तर्क है कि सरकार केवल नियुक्तियों को रद्द करने की कथित निहित शक्ति का हवाला देकर वैधानिक सुरक्षा और निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकती।

वक्फ कानून की किन धाराओं पर विवाद टिका है?

अपीलकर्ताओं ने वक्फ कानून के उन प्रावधानों का हवाला दिया है, जो बोर्ड के सदस्यों के कार्यकाल, उन्हें हटाने और बोर्ड को अधिक्रमित करने की प्रक्रिया से संबंधित हैं।

  • धारा 15: अपीलकर्ताओं के अनुसार, यह बोर्ड के सदस्यों के पांच वर्ष के कार्यकाल से संबंधित प्रावधान है।
  • धारा 20: सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान।
  • धारा 99: बोर्ड को अधिक्रमित करने की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान।
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अपीलकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सदस्यों को हटाना या बोर्ड का पुनर्गठन करना कानून के अनुरूप नहीं होगा।

इन दलीलों पर अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है। अंतरिम राहत से इनकार किए जाने को पुनर्गठन की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

29 अक्टूबर को अगली सुनवाई

केरल हाईकोर्ट ने नवनियुक्त बोर्ड सदस्यों को नोटिस देने का निर्देश देते हुए मामले को 29 अक्टूबर को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अगली सुनवाई में बोर्ड के पुनर्गठन की वैधानिकता, सदस्यों के कार्यकाल और सरकार की शक्तियों से जुड़े सवालों पर आगे विचार हो सकता है।

कानूनी महत्व: यह मामला सरकारी प्रशासनिक निर्णयों और वैधानिक निकायों के सदस्यों के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत के समक्ष प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या राज्य सरकार को बोर्ड के पुनर्गठन का अधिकार संबंधित कानून के तहत प्राप्त था और क्या उस अधिकार का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया गया।

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