‘आप Gen Z नहीं हैं’: Cockroach Janta Party के नेताओं की उम्र पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी, याचिकाकर्ताओं ने ली याचिका वापस

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दिल्ली हाईकोर्ट में Cockroach Janta Party के नेताओं की उम्र को लेकर Gen Z पर हल्का-फुल्का संवाद हुआ। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका में वैकल्पिक कानूनी उपाय पर भी सवाल उठाया। बाद में याचिकाकर्ताओं ने याचिका वापस ले ली।

दिल्ली हाईकोर्ट में Cockroach Janta Party (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई के दौरान Gen Z को लेकर हल्का-फुल्का संवाद देखने को मिला। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछने के बाद टिप्पणी की कि वे Gen Z का हिस्सा नहीं हैं।

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमनी से उनकी उम्र पूछी। वकील ने बताया कि सौरव दास की उम्र 27 वर्ष और आशुतोष रांका की उम्र 32 वर्ष है।

इस पर अदालत ने पूछा, “तो आप Gen Z नहीं हैं। Gen Z क्या है?”

जब अदालत को बताया गया कि आम तौर पर 1997 के बाद जन्मे लोगों को Gen Z माना जाता है, तो पीठ ने दोहराया, “तो आप Gen Z नहीं हैं।”

हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी गई थी चुनौती

यह बातचीत उस समय हुई, जब हाईकोर्ट Cockroach Janta Party के नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate) द्वारा उनकी न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

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याचिकाकर्ताओं ने हिरासत बढ़ाने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया था।

अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने पर अदालत का सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की, जबकि संबंधित आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका (Revision) जैसे वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।

अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है। हालांकि, जहां कानून में वैकल्पिक प्रभावी उपाय उपलब्ध हो, वहां हाईकोर्ट सामान्यतः उस उपाय के इस्तेमाल पर विचार कर सकता है। यह नियम पूर्ण प्रतिबंध नहीं है और मामले की परिस्थितियों के आधार पर अदालत निर्णय लेती है।

दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और अधिवक्ता आशीष दीक्षित पेश हुए, जबकि अभिक चिमनी ने सौरव दास, आशुतोष रांका और अन्य याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व किया।

याचिकाकर्ताओं ने वापस ली याचिका

सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

इसलिए अदालत की टिप्पणियों को हिरासत बढ़ाने के आदेश की वैधता पर अंतिम निर्णय या याचिकाकर्ताओं के दावों की न्यायिक अस्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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