न्यायपालिका पर ‘भ्रष्टाचार’ अध्याय: सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान, अश्विनी कुमार बोले—संस्थागत गरिमा से समझौता नहीं

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भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों में न्यायपालिका ने “व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा, न्याय के संवर्धन और लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में अद्वितीय सेवा”

NCERT की कक्षा 8 की नई किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया। CJI सूर्यकांत ने कहा—संस्था को बदनाम नहीं होने देंगे। पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की मांग की।

कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर जोड़ा गया अध्याय अब न्यायपालिका के सर्वोच्च मंच तक पहुंच गया है। Supreme Court of India ने बुधवार को इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान (suo motu) लेते हुए स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायिक संस्थान की प्रतिष्ठा को आंच नहीं आने दी जाएगी।

पूर्व कानून मंत्री Ashwani Kumar ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों में न्यायपालिका ने “व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा, न्याय के संवर्धन और लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में अद्वितीय सेवा” दी है। उन्होंने दो टूक कहा कि न्यायपालिका को भ्रष्ट बताने वाले नैरेटिव को वैधता देना “पूर्णतः अस्वीकार्य” है।

CJI सूर्यकांत का सख्त रुख

प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने यह मुद्दा उठाया। CJI ने कहा कि यह मामला “पूरे संस्थान—बार और बेंच—से जुड़ा है” और वे इस पर स्वत: संज्ञान ले रहे हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं किसी को भी, चाहे वह कितना ही ऊंचे पद पर क्यों न हो, संस्था को बदनाम नहीं करने दूंगा।” CJI ने यह भी संकेत दिया कि यह एक “सोचा-समझा और गहराई से जुड़ा हुआ” मामला प्रतीत होता है और वे इस पर पहले से कदम उठा रहे हैं।

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किताब में क्या बदला?

National Council of Educational Research and Training (NCERT) द्वारा प्रकाशित संशोधित अध्याय ‘The Role of the Judiciary in Our Society’ में पहली बार न्यायपालिका की संरचना और कार्यप्रणाली के साथ-साथ चुनौतियों—जैसे भ्रष्टाचार और लंबित मामलों—पर चर्चा की गई है।

पहले के संस्करणों में मुख्यतः अदालतों की संरचना, अधिकार-क्षेत्र और न्याय तक पहुंच जैसे पहलुओं पर जोर था। नए संस्करण में न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।

‘चयनात्मक आलोचना’ पर सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal और Abhishek Manu Singhvi ने अदालत के समक्ष दलील दी कि यदि पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार की चर्चा करनी है तो अन्य संस्थानों—जैसे नौकरशाही, राजनीति या जांच एजेंसियों—का भी उल्लेख होना चाहिए।

उनका तर्क था कि बच्चों को यह पढ़ाया जाना कि भ्रष्टाचार केवल न्यायपालिका में है, एकतरफा प्रस्तुति है। इससे संस्थागत संतुलन और संवैधानिक समझ प्रभावित हो सकती है।

कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया मंच X पर भी सवाल उठाया कि राजनेताओं, मंत्रियों, लोक सेवकों और अन्य संस्थाओं में भ्रष्टाचार पर समान स्पष्टता क्यों नहीं दिखाई गई।

अश्विनी कुमार: ‘न्यायपालिका एक पूज्य संस्था’

अश्विनी कुमार ने कहा कि न्यायपालिका भारतीय गणराज्य की एक “पूज्य और गरिमामयी संस्था” है। उन्होंने CJI के कदम की सराहना करते हुए कहा कि यह निर्णय न्यायपालिका के “संस्थागत अवमूल्यन” को रोकने की दिशा में सही पहल है।

उनका कहना था कि आलोचना और सुधार की गुंजाइश लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी भी संस्थान के खिलाफ “प्रचार को पवित्रता का जामा पहनाना” स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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संस्थागत गरिमा बनाम अकादमिक विमर्श

यह विवाद एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को जन्म देता है—क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत कमियों पर चर्चा लोकतांत्रिक शिक्षा का हिस्सा है, या इससे संस्थागत भरोसे को ठेस पहुंचती है?

सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान यह संकेत देता है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत प्रतिष्ठा और सार्वजनिक धारणा से जुड़े व्यापक प्रश्न के रूप में देख रही है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कोर्ट इस मामले में क्या दिशा-निर्देश देता है—क्या यह अकादमिक स्वतंत्रता की सीमा तय करेगा, या संस्थागत आलोचना के संतुलित मानदंड निर्धारित करेगा।


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