फर्जी केस लॉ और AI हॉलुसिनेशन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृतिक हीरों को लैब-ग्रोन डायमंड बताने के मामले में ₹425 करोड़ की कस्टम्स पेनल्टी रद्द कर दी। कोर्ट ने AI से गढ़े फर्जी केस लॉ पर सख्त टिप्पणी की।
फर्जी केस लॉ और AI हॉलुसिनेशन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
प्राकृतिक हीरों को लैब-ग्रोन डायमंड बताकर कम टैरिफ का भुगतान करने के आरोप से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 114 के तहत लगाई गई भारी पेनल्टी को रद्द कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की डिवीजन बेंच ने कहा कि आदेश में गैर-मौजूद केस लॉ, फर्जी citations और AI द्वारा hallucinate किए गए ratios पर भरोसा किया जाना आदेश की वैधता के लिए घातक साबित हुआ।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन “assistance can never be substituted for adjudication”। कोर्ट ने चेतावनी दी कि AI को “pilot’s seat” सौंपना “imprudent and dangerous” होगा।
प्राकृतिक हीरों को लैब-ग्रोन बताने पर ₹425 करोड़ की पेनल्टी
मामला 8 अक्टूबर 2025 को सूरत के Additional Commissioner of Customs द्वारा पारित Order-in-Original से जुड़ा था। इसमें अपीलकर्ता पर प्राकृतिक हीरों की खेप को लैब-ग्रोन डायमंड के रूप में गलत घोषित कर कम टैरिफ का लाभ लेने के आरोप में ₹425,27,99,100 की पेनल्टी लगाई गई थी।
अपीलकर्ता ने इस आदेश को गुजरात हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को अपील खारिज कर दी। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने केस लॉ की व्यक्तिगत रूप से जांच की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के merits में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अपीलकर्ता ने गंभीर आरोप लगाया था कि 8 अक्टूबर 2025 के Order-in-Original में प्रतिवादी द्वारा उद्धृत कई judgments और articles Artificial Intelligence की मदद से तैयार किए गए थे।
कोर्ट ने उद्धृत judgments और articles की एक-एक करके जांच की। जांच में सामने आया कि कुछ केस लॉ पूरी तरह गैर-मौजूद थे या उनके citations फर्जी थे।
कोर्ट ने यह भी पाया कि कुछ ऐसे judgments वास्तव में मौजूद थे, लेकिन उनमें वह ratio निर्धारित नहीं किया गया था जो Order-in-Original में उनसे निकाला गया था। कोर्ट के अनुसार, यह सामग्री AI की hallucination प्रतीत होती है।
AI से तैयार फर्जी precedents पर पहले भी चेतावनी
कोर्ट ने Pooja Ramesh Singh v. Jammu & Kashmir Bank Ltd. (2026) के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में कोर्ट ने AI-generated precedents को बिना verification के प्रस्तुत करने, cite करने या इस्तेमाल करने के प्रति zero-tolerance approach अपनाने की आवश्यकता बताई थी।
कोर्ट ने कहा था कि बिना सत्यापन के ऐसे judgments को cite करना वकील की ओर से misconduct है। इसी तरह, यदि कोई judge ऐसे fake या AI-hallucinated material को निर्णय के समर्थन में precedent के रूप में इस्तेमाल करता है, तो यह गंभीर चूक है।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि decision-making process में fake या hallucinated material का थोड़ा सा भी प्रवेश हो जाए, तो adjudication की sanctity प्रभावित होती है और ऐसा निर्णय कानून की नजर में निर्णय नहीं माना जा सकता।
“AI सहायक हो सकता है, adjudicator नहीं”
वर्तमान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने AI के इस्तेमाल के खिलाफ पूर्ण निषेध का रुख नहीं अपनाया। कोर्ट ने माना कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए AI को assistive tool के रूप में इस्तेमाल करने से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा:
“Assistance can never be substituted for adjudication. AI may well serve as training wheels but entrusting it with the pilot’s seat would be both imprudent and dangerous.”
अर्थात AI निर्णय लेने में सहायता कर सकता है, लेकिन वह स्वयं adjudication का स्थान नहीं ले सकता। AI को प्रक्रिया में सहायक के रूप में इस्तेमाल करना संभव है, लेकिन निर्णय की बागडोर उसे सौंपना उचित और सुरक्षित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ₹425 करोड़ की पेनल्टी वाला आदेश किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि AI के इस्तेमाल के कारण ऐसे संदिग्ध और अविश्वसनीय material पर भरोसा किया गया, जिससे Order-in-Original की स्थिरता प्रभावित हुई।
इसके परिणामस्वरूप कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के 20 जनवरी 2026 के आदेश के साथ-साथ 8 अक्टूबर 2025 के Order-in-Original को भी रद्द कर दिया।
मामले की कार्यवाही को नए सिरे से adjudication के लिए बहाल किया गया। हालांकि, नई सुनवाई उसी rank के किसी अन्य अधिकारी द्वारा की जाएगी, जिसने मूल Order-in-Original पारित किया था वह अधिकारी दोबारा मामले की सुनवाई नहीं करेगा।
मूल अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई पर नियुक्ति प्राधिकारी को विवेक
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर Order-in-Original के लेखक के खिलाफ कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई शुरू करने का निर्णय appointing authority के विवेक पर छोड़ दिया।
सिविल अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लंबित applications, यदि कोई हों, का भी निस्तारण कर दिया।
कोर्ट्स में AI के इस्तेमाल को लेकर नए Regulations का भी उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि उसने हाल ही में Artificial Intelligence in Courts, 2026 के Draft Regulations जारी किए हैं और उन पर comments एवं suggestions आमंत्रित किए गए हैं।
इस मामले का संदेश स्पष्ट है—AI न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने में उपयोगी उपकरण हो सकता है, लेकिन उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई कानूनी सामग्री का स्वतंत्र सत्यापन अनिवार्य है। गैर-मौजूद judgments, फर्जी citations या गलत ratios पर आधारित adjudication की कीमत पूरा आदेश रद्द होने के रूप में चुकानी पड़ सकती है।
फैसला
Vijay Ghanshyam Gadiya v. Union of India, SLP (Civil) No. 15605 of 2026, निर्णय दिनांक: 2 सितंबर 2026।
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