गुजरात HC को ‘गैंबलिंग डेन’ टिप्पणी पर यतीन ओझा दोषी बरकरार, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सजा अनिश्चितकाल के लिए रोकी

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सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट को “गैंबलिंग डेन” कहने के मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता यतीन ओझा की अवमानना दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उनकी सजा और दोषसिद्धि को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया।

Supreme Court of India ने वरिष्ठ अधिवक्ता Yatin Narendra Oza को गुजरात हाईकोर्ट को “गैंबलिंग डेन” (जुए का अड्डा) कहने के मामले में आपराधिक अवमानना का दोषी तो माना, लेकिन एक “अंतिम क्षमादान” के रूप में उनकी सजा और दोषसिद्धि को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया।

न्यायमूर्ति J.K. Maheshwari और न्यायमूर्ति Atul S. Chandurkar की खंडपीठ ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अवमानना के लिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत न्यायालय विशेष परिस्थितियों में राहत दे सकता है।

कोविड काल की प्रेस कॉन्फ्रेंस से शुरू हुआ विवाद

मामला 5 जून 2020 की उस लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ा है, जिसे फेसबुक पर प्रसारित किया गया था। उस समय कोविड-19 महामारी के कारण अदालतों का कामकाज सीमित था।

तत्कालीन Gujarat High Court Advocates’ Association (GHCAA) अध्यक्ष यतीन ओझा ने प्रेस वार्ता में गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री पर भ्रष्टाचार, प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता देने और मामलों की कथित हेराफेरी के आरोप लगाए थे।

उन्होंने हाईकोर्ट को “गैंबलिंग डेन” बताते हुए कहा था कि केवल पैसे और प्रभाव वाले लोगों को राहत मिलती है, जबकि आम वादकारी और जूनियर वकील परेशान होते हैं।

गुजरात हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की थी कार्रवाई

Gujarat High Court ने 9 जून 2020 को स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा था कि ओझा के बयान “गैर-जिम्मेदाराना, सनसनीखेज और असंतुलित” हैं तथा उन्होंने बिना किसी आधार के न्यायपालिका की साख पर सवाल उठाए।

इसके बाद कोर्ट ने Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 17 के तहत नोटिस जारी किया और आगे ऐसे बयान देने पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने कहा- माफी केवल बचने की रणनीति

यतीन ओझा ने कई चरणों में बिना शर्त माफी मांगी और कहा कि उन्होंने कोविड काल में जूनियर वकीलों की परेशानियों के कारण भावनात्मक तनाव में यह टिप्पणी की थी।

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हालांकि हाईकोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ओझा का व्यवहार एक पैटर्न बन चुका है—“पहले थप्पड़ मारो, फिर माफी मांगो और भूल जाओ।”

कोर्ट ने माना कि “गैंबलिंग डेन” जैसी टिप्पणी ने न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचाया।

वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा भी छीना गया

अवमानना कार्यवाही के समानांतर, गुजरात हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने Gujarat High Court Designation of Senior Advocate Rules, 2018 के तहत यतीन ओझा का वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) का दर्जा वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की।

फुल कोर्ट ने 18 जुलाई 2020 को सर्वसम्मति से उनका वरिष्ठ दर्जा वापस ले लिया और उनकी माफी को “कागजी माफी” बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले दी थी अस्थायी राहत

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में अवमानना आदेश पर रोक लगाई और 2022 में अनुच्छेद 142 के तहत ओझा का वरिष्ठ अधिवक्ता दर्जा दो वर्षों के लिए अस्थायी रूप से बहाल कर दिया था, यह शर्त रखते हुए कि उनका आचरण “निर्दोष” होना चाहिए।

हालांकि 2024 में फिर एक नई घटना सामने आई, जिसमें गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ओझा पर “फोरम शॉपिंग” का आरोप लगाने का आरोप लगा। इसके बाद फुल कोर्ट ने उनका वरिष्ठ दर्जा फिर वापस लेने का प्रस्ताव पारित किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अवमानना और वरिष्ठ दर्जा अलग मुद्दे

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक अवमानना और वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा वापस लेना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।

पीठ ने कहा:

“अवमानना की शक्ति केवल वैधानिक नहीं, बल्कि संवैधानिक भी है, जो अनुच्छेद 215 से प्राप्त होती है।”

कोर्ट ने माना कि यतीन ओझा का आचरण एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुरूप नहीं था, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उन्होंने पेशेवर और सामाजिक रूप से काफी नुकसान झेला है।

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अनुच्छेद 142 के तहत मिली राहत

सभी परिस्थितियों—कोविड काल, बार अध्यक्ष के रूप में दबाव, बार-बार मांगी गई माफी, पेशेवर नुकसान और सुधारात्मक दृष्टिकोण—को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को समाप्त करने का फैसला किया।

कोर्ट ने आदेश दिया कि:

  • यतीन ओझा की अवमानना दोषसिद्धि और सजा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित रहेगी।
  • उनके खिलाफ कोई कानूनी अयोग्यता लागू नहीं होगी।
  • Advocates Act, 1961 की धारा 24-A के तहत भी उन्हें अयोग्य नहीं माना जाएगा।
  • गुजरात हाईकोर्ट हर दो वर्ष में उनके आचरण की समीक्षा करेगा।
  • यदि भविष्य में वे फिर ऐसा आचरण करते हैं, तो हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट से सजा पुनर्जीवित करने की मांग कर सकता है।

न्यायिक गरिमा और सुधारात्मक न्याय के बीच संतुलन

यह फैसला न्यायपालिका की गरिमा और सुधारात्मक न्याय (reformative justice) के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि यतीन ओझा भविष्य में अपने आचरण से न्यायपालिका और बार की गरिमा बनाए रखेंगे।

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