‘पसंद का या जाति आधारित जांच अधिकारी नहीं मांग सकते’: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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‘पसंद का या जाति आधारित IO नहीं मांग सकते’: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद या जाति विशेष के जांच अधिकारी की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने प्रक्रिया के दुरुपयोग पर जताई नाराज़गी।


मामला: जांच अधिकारी की नियुक्ति को लेकर विवाद

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति अदालत से यह निर्देश नहीं मांग सकता कि जांच अधिकारी (IO) उसकी पसंद का हो या किसी विशेष जाति से संबंधित हो।

यह टिप्पणी जालौन निवासी गायत्री और अन्य द्वारा दायर आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई।


कोर्ट की टिप्पणी: “न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग”

न्यायमूर्ति Justice Abdul Shahid की एकलपीठ ने कहा कि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है और प्रतिवादी “साफ हाथों” (clean hands) के साथ अदालत में नहीं आया।

अदालत ने इस तरह की मांगों को न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के विपरीत बताया।


पृष्ठभूमि: एनसीआर से शुरू हुआ विवाद

मामले की शुरुआत उरई में दर्ज एक एनसीआर से हुई, जिसमें Indian Penal Code की धारा 323, 504 और 506 के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी।

जांच के बाद चार आरोपितों—लखन, नरेश, राम अवतार और राजू—के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।


प्रतिवादी की कार्रवाई: 156(3) के तहत आवेदन

इसके बाद प्रतिवादी नरेश कुमार ने Section 156(3) CrPC के तहत आवेदन दायर कर शिकायतकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज करवाया।

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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर IPC और Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act के तहत केस दर्ज हुआ, लेकिन जांच में आरोप सिद्ध नहीं होने पर अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई।


नई मांग: “SC समुदाय का अधिकारी नियुक्त हो”

इसके बाद प्रतिवादी ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विरोध याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि जांच पक्षपातपूर्ण थी।

याचिका में यह भी मांग की गई कि जांच ऐसे उप पुलिस अधीक्षक से कराई जाए, जो अनुसूचित जाति से हो—जिसे कोर्ट ने अस्वीकार्य बताया।


निचली अदालत की कार्यवाही और समन

विरोध याचिका को शिकायत के रूप में दर्ज कर Sections 200 and 202 CrPC के तहत बयान लिए गए।

इसके बाद विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट), उरई ने अपीलार्थियों को समन जारी किया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।


हाईकोर्ट की टिप्पणी: समन आदेश में विसंगति

हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित समन आदेश और मूल शिकायत की सामग्री में स्पष्ट अंतर है।

साथ ही, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी गई थी और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।


डिस्चार्ज आवेदन खारिज, फिर हाईकोर्ट का रुख

आवेदकों ने 15 मार्च 2024 को विशेष न्यायाधीश के समक्ष डिस्चार्ज आवेदन दायर किया, जिसे 5 अगस्त 2024 को खारिज कर दिया गया।

इस आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां अब मामला विचाराधीन है।

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अगली सुनवाई: 30 अप्रैल को

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 30 अप्रैल को निर्धारित की है, जहां समन आदेश और अन्य कानूनी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।


निष्कर्ष: जांच में निष्पक्षता सर्वोपरि

यह आदेश स्पष्ट करता है कि जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता अनिवार्य है और इसे जाति या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।

साथ ही, अदालत ने यह संदेश भी दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों के प्रति सख्त रुख अपनाया जाएगा।


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