पत्नी की जानकारी बिना दायर याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, ₹25,000 जुर्माना

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की जानकारी के बिना दाखिल हेबियस कॉर्पस याचिका को दुरुपयोग मानते हुए खारिज किया। पति पर ₹25,000 का जुर्माना और पुलिस निगरानी के आदेश।


मामला: हेबियस कॉर्पस याचिका का कथित दुरुपयोग

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण आदेश में पत्नी की जानकारी और सहमति के बिना दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को अदालत की प्रक्रिया का “घोर दुरुपयोग” करार देते हुए खारिज कर दिया।

यह याचिका प्रयागराज के कर्नलगंज निवासी अनुज पांडेय द्वारा अपनी पत्नी की कथित अवैध हिरासत के आरोप में दाखिल की गई थी।


कोर्ट की सख्ती: मंशा पर उठे गंभीर सवाल

Justice Vinod Diwakar ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की मंशा पर कड़े सवाल उठाए और कहा कि अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई है।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए 25,000 रुपये का हर्जाना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि दो महीने के भीतर हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन में जमा की जाए।


चौंकाने वाला खुलासा: पत्नी की सहमति ही नहीं

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी शिक्षा जायसवाल को बिना उनकी जानकारी और सहमति के याचिका में सह-याचिकाकर्ता बना दिया था।

पत्नी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उनके हस्ताक्षर डराकर और धोखाधड़ी से लिए गए थे, जिनके आधार पर फर्जी हलफनामे और विवाह प्रमाण पत्र तैयार किए गए।

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पत्नी की शिकायत: डिजिटल ब्लैकमेलिंग और साइबर स्टॉकिंग

मामले ने तब गंभीर रूप ले लिया जब यह सामने आया कि पत्नी ने स्वयं अपने पति के खिलाफ डिजिटल ब्लैकमेलिंग और साइबर स्टॉकिंग जैसे गंभीर आरोपों में प्राथमिकी दर्ज कराई है।

इससे याचिका की विश्वसनीयता पर और भी सवाल खड़े हो गए।


आपराधिक इतिहास: “आदतन अपराधी” की टिप्पणी

अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि अनुज पांडेय के खिलाफ हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी, गैंगस्टर एक्ट और आर्म्स एक्ट सहित कई गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।

कोर्ट ने उसे “आदतन अपराधी” बताते हुए कहा कि उसके खिलाफ 15,000 रुपये का इनाम भी घोषित है।


न्यायालय की टिप्पणी: “साफ हाथों से आना जरूरी”

कोर्ट ने कहा कि Habeas Corpus जैसी संवैधानिक राहत, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है, उसका इस्तेमाल वे लोग नहीं कर सकते जो तथ्यों को छिपाकर और गलत तरीके से अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।

यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है।


पुलिस को निर्देश: एक साल तक निगरानी

अदालत ने प्रयागराज पुलिस को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों पर कम से कम एक वर्ष तक कड़ी निगरानी रखी जाए।

साथ ही, यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया कि यदि वह किसी गैर-कानूनी गतिविधि में शामिल पाया जाता है या अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए खतरा बनता है, तो उसकी जमानत रद्द करने की कार्रवाई की जाए।

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आगे की कार्रवाई: प्रगति रिपोर्ट तलब

कोर्ट ने प्रयागराज के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर अनुज पांडेय के खिलाफ लंबित मामलों की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए।


निष्कर्ष: न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ा संदेश

यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि अदालतें संवैधानिक उपायों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेंगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बने कानूनों का इस्तेमाल केवल न्यायोचित और ईमानदार मामलों में ही किया जा सकता है।


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