बिना सत्यापन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड साक्ष्य नहीं कस्टम्स पेनल्टी रद्द: CESTAT

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फर्जी DVD के आधार पर कस्टम्स पेनल्टी रद्द: CESTAT ने कहा—बिना सत्यापन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड साक्ष्य नहीं

CESTAT ने 2009 बैच के IRS अधिकारी पर कस्टम्स एक्ट की धारा 114-AA के तहत लगाई गई पेनल्टी रद्द कर दी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि कथित DVD इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं क्योंकि उसकी सत्यता की जांच नहीं हुई और धारा 138-C व Evidence Act की धारा 65-B का पालन नहीं किया गया।


Customs, Excise and Service Tax Appellate Tribunal (CESTAT) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बिना सत्यापन और विधिक प्रमाणन के किसी DVD या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने इस आधार पर 2009 बैच के IRS अधिकारी पर लगाई गई कस्टम्स पेनल्टी को रद्द कर दिया।

दो सदस्यीय पीठ—न्यायिक सदस्य Ashok Jindal और तकनीकी सदस्य K Anpazhakan—ने कहा कि Customs Act, 1962 की धारा 114-AA के तहत पेनल्टी लगाने के लिए आवश्यक शर्तें इस मामले में पूरी नहीं हुईं, क्योंकि रिकॉर्ड पर कोई ठोस, विश्वसनीय या पुष्ट साक्ष्य मौजूद नहीं था।

मामला क्या था

राजस्व विभाग के अनुसार, Directorate of Revenue Intelligence (DRI) की कोलकाता ज़ोनल यूनिट ने पेट्रापोल लैंड कस्टम्स स्टेशन के माध्यम से किए गए कथित फर्जी निर्यात की जांच की थी। आरोप था कि कुछ निर्यातकों ने दो कंपनियों के IEC का इस्तेमाल करते हुए सामान की गुणवत्ता, मात्रा और मूल्य में गलत घोषणा की या कबाड़ सामान निर्यात कर ड्यूटी ड्रॉबैक का लाभ लिया।

जांच के दौरान एक कंपनी Spak Enterprises Pvt. Ltd. के परिसर से कथित रूप से एक DVD बरामद हुई, जिसमें “Petrapole” नाम के कंप्यूटर से जुड़ा निर्यात डेटा होने का दावा किया गया।

इसके आधार पर DRI ने एक निजी व्यक्ति ज्योति बिस्वास (JB) से पूछताछ की। उसके कथित बयान में कहा गया कि उसने 2012-2014 के दौरान बांग्लादेश को निर्यात से जुड़े दस्तावेज़ तैयार करने में कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जीवाड़ा किया, जिसमें अपीलकर्ता अधिकारी का नाम भी शामिल बताया गया।

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इसके बाद कस्टम्स विभाग ने निर्यातकों से कथित तौर पर गलत तरीके से प्राप्त ड्रॉबैक की वसूली और अधिकारियों सहित कई आरोपियों पर पेनल्टी लगाने का प्रस्ताव रखा।

ट्रिब्यूनल के सामने मुख्य सवाल

ट्रिब्यूनल के सामने दो प्रमुख कानूनी प्रश्न थे—

  1. क्या बिना सत्यापन के DVD जैसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य माना जा सकता है?
  2. क्या सह-आरोपी के बाद में वापस लिए गए बयान के आधार पर पेनल्टी लगाई जा सकती है?

DVD की विश्वसनीयता पर सवाल

ट्रिब्यूनल ने पाया कि जिस DVD पर पूरा आरोप आधारित था, वह मूल रूप में उपलब्ध ही नहीं थी। रिकॉर्ड में बताया गया कि जब DVD बरामद की गई थी, तब वह DRI की कस्टडी में ही टूटे हुए हालत में पाई गई।

इसके अलावा जिस कंप्यूटर या हार्ड डिस्क से कथित डेटा लिया गया था, उसे भी जांच के दौरान प्रस्तुत नहीं किया गया।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आसानी से छेड़छाड़ या बदलाव के प्रति संवेदनशील होते हैं, इसलिए उनकी सत्यता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना मूल डिवाइस से सत्यापन किए “पुनर्निर्मित DVD” पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

साथ ही जांच एजेंसी ने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 65-B तथा कस्टम्स एक्ट की धारा 138-C के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्राप्त नहीं किया था।

इस संदर्भ में ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Commissioner of Customs v Jeen Bhavani International का भी उल्लेख किया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए वैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य बताया गया था।

सह-आरोपी का बयान भी अविश्वसनीय

ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि सह-आरोपी ज्योति बिस्वास का बयान अदालत में उसी दिन वापस ले लिया गया था।

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पीठ ने कहा कि कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि केवल संदेह के आधार पर दोष तय नहीं किया जा सकता।

जब बयान वापस ले लिया गया हो और उसके समर्थन में कोई स्वतंत्र या दस्तावेजी साक्ष्य न हो, तो उसे किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ उपयोग नहीं किया जा सकता।

धारा 114-AA लागू नहीं

ट्रिब्यूनल ने कहा कि धारा 114-AA तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति कस्टम्स से जुड़े लेन-देन में झूठे या गलत दस्तावेज़ प्रस्तुत करे।

मगर इस मामले में यह साबित ही नहीं हुआ कि अपीलकर्ता किसी निर्यात प्रक्रिया में शामिल थे या उन्होंने कोई गलत घोषणा की थी।

इसके अलावा उनका नाम मूल शो-कॉज नोटिस में भी नहीं था और बाद में जांच के दौरान जोड़ा गया था।

फैसला

इन सभी कारणों से CESTAT ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद नहीं हैं।

इसलिए ट्रिब्यूनल ने अपील स्वीकार करते हुए धारा 114-AA के तहत लगाई गई पेनल्टी को अस्थिर और अवैध बताते हुए रद्द कर दिया।

Case: Vikash Kumar v Commissioner of Customs


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