27 लाख मामलों में सिर्फ 136 अपीलों का निस्तारण
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट संशोधन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। TMC ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने का असर चुनाव नतीजों पर पड़ा। कोर्ट ने अलग आवेदन दायर करने की सलाह देते हुए लंबित अपीलों पर जल्द सुनवाई के संकेत दिए।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) को सुझाव दिया कि यदि उसे चुनाव परिणामों पर SIR प्रक्रिया के प्रभाव को लेकर शिकायत है, तो वह अलग से आवेदन दाखिल कर सकती है।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने से संबंधित लंबित अपीलों के मुद्दे पर वह कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगेगी और मामले के शीघ्र समाधान की संभावनाओं पर विचार करेगी।
TMC का आरोप- वोटर डिलीशन से प्रभावित हुए चुनाव परिणाम
तृणमूल कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने का सीधा असर विधानसभा चुनाव परिणामों पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र में TMC मात्र 862 वोटों के अंतर से चुनाव हार गई, जबकि लगभग 5,000 मतदाताओं की सूची में नाम शामिल किए जाने संबंधी अपीलें अब भी लंबित हैं।
बनर्जी ने तर्क दिया कि यदि इन अपीलों का समय पर निस्तारण हो जाता, तो चुनाव परिणाम अलग हो सकते थे।
चुनाव आयोग ने कहा- चुनाव याचिका ही उचित उपाय
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि SIR प्रक्रिया में कथित त्रुटियों का जवाब आयोग दे सकता है, लेकिन यदि किसी राजनीतिक दल को चुनाव परिणामों पर आपत्ति है तो उसका समाधान चुनाव याचिका के माध्यम से ही किया जा सकता है।
इस पर कल्याण बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा की गई SIR प्रक्रिया स्वयं चुनाव याचिका में चुनौती का आधार बनेगी।
बंगाल चुनाव में BJP को बहुमत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 294 सदस्यीय सदन में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 206 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि 15 वर्षों तक राज्य की सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को केवल 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची संशोधन और बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोप चुनाव बाद की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है विशेष निर्देश
इससे पहले 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की अपीलों पर त्वरित सुनवाई का निर्देश दिया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं और जिन्होंने अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील दाखिल की है, उनके मामलों में प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जा सकती है, खासकर तब जब अपीलकर्ता अत्यावश्यकता साबित कर सकें।
कोर्ट ने प्रभावित लोगों और अन्य पक्षकारों को कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक स्तर पर भी अपनी शिकायत रखने की स्वतंत्रता दी थी।
27 लाख मामलों में सिर्फ 136 अपीलों का निस्तारण
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि लगभग 27 लाख अपीलों में से अब तक केवल 136 मामलों का ही निस्तारण हुआ है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को अपीलों के जल्द निपटारे की अपेक्षा थी, लेकिन प्रक्रिया बेहद धीमी है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह लंबित मामलों के निस्तारण की स्थिति पर रिपोर्ट मंगाकर आगे आवश्यक आदेश पारित कर सकती है।
चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे मतदाता अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और चुनाव आयोग की प्रक्रियात्मक जवाबदेही से जुड़े बड़े संवैधानिक प्रश्न के रूप में देखा जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में विस्तृत दिशानिर्देश जारी करती है, तो भविष्य में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रियाओं पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
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