“तारीख पे तारीख” पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: देरी के लिए जज नहीं, सरकार और पुलिस जिम्मेदार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्टों में लंबित मामलों और “तारीख पे तारीख” संस्कृति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि मुकदमों में देरी के लिए न्यायिक अधिकारी नहीं, बल्कि स्टाफ की कमी, पुलिस की लापरवाही और कमजोर फॉरेंसिक व्यवस्था जिम्मेदार हैं।
Allahabad High Court ने राज्य की ट्रायल अदालतों में बढ़ते लंबित मुकदमों और “तारीख पे तारीख” की समस्या पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए न्याय व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों को सामने रखा है।
न्यायमूर्ति Arun Kumar Singh Deshwal की पीठ ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक मामलों के निस्तारण में हो रही देरी के लिए न्यायिक अधिकारियों की कार्यक्षमता को दोष देना अनुचित है। अदालत ने कहा कि इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से राज्य सरकार की प्रशासनिक विफलता, कर्मचारियों की भारी कमी और पुलिस विभाग की लापरवाही जिम्मेदार है।
“न्यायपालिका को सरकारी विभाग बनाकर नहीं चलाया जा सकता”
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्वतंत्र और पारदर्शी न्यायिक व्यवस्था लोकतंत्र की आधारशिला होती है। यदि न्यायपालिका को बुनियादी ढांचे, संसाधनों और कर्मचारियों के लिए सरकार की दया पर निर्भर रहना पड़े, तो वह एक संघर्षरत सरकारी विभाग बनकर रह जाती है।
यह टिप्पणी मेवालाल प्रजापति की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जहां अदालत ने पाया कि मुकदमों में देरी केवल न्यायालयों की वजह से नहीं बल्कि प्रशासनिक अक्षमताओं का परिणाम है।
ट्रायल कोर्टों में स्टाफ की भारी कमी
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की निचली अदालतों में पेशकार, आशुलिपिक और अन्य अनुसचिवीय कर्मचारियों की भारी कमी है। स्थिति यह है कि एक-एक क्लर्क को हजारों फाइलों का काम संभालना पड़ रहा है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है।
कोर्ट ने माना कि न्यायाधीशों के सामने केवल आदेश पारित करने का काम नहीं होता, बल्कि रिकॉर्ड प्रबंधन, समन प्रक्रिया और फाइल संचालन जैसे कई प्रशासनिक कार्य भी अदालत की कार्यक्षमता से जुड़े होते हैं।
पुलिस की लापरवाही भी देरी का बड़ा कारण
अदालत ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि समन और वारंट का समय पर तामील न होना, गवाहों की अनुपस्थिति और विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों का अदालत में पेश न होना मुकदमों में अनावश्यक देरी का प्रमुख कारण है।
पीठ ने कहा कि जब तक पुलिस अभियुक्तों और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं करेगी, तब तक किसी भी न्यायाधीश से समयबद्ध फैसले की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।
“दामिनी” फिल्म का जिक्र, ‘तारीख पे तारीख’ पर टिप्पणी
फैसले में अदालत ने वर्ष 1993 की प्रसिद्ध फिल्म Damini के चर्चित संवाद “तारीख पे तारीख” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अब आम जनता की न्यायपालिका के प्रति धारणा बन चुकी है।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वास्तविकता यह है कि किसी भी मामले में निर्णय तब तक संभव नहीं होता, जब तक पुलिस समय पर गवाह और आरोपी पेश न करे तथा फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध न कराई जाए।
फॉरेंसिक लैब की स्थिति पर भी चिंता
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की स्थिति को भी “दयनीय” बताया। अदालत ने कहा कि आधुनिक मशीनों और पर्याप्त स्टाफ की कमी के कारण रिपोर्ट आने में अत्यधिक समय लग रहा है, जिससे ट्रायल प्रभावित हो रहे हैं।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि वर्तमान में पुलिस विभाग के अधीन संचालित फॉरेंसिक लैब्स को गृह मंत्रालय के अधीन एक स्वतंत्र और स्वायत्त विभाग बनाया जाए, ताकि वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से अधिक सक्षम हो सकें।
ई-समन और AI तकनीक के इस्तेमाल के निर्देश
डिजिटल इंडिया के दौर का उल्लेख करते हुए अदालत ने आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ई-समन और ई-वारंट की सेवा के लिए व्हाट्सएप, टेलीग्राम और ईमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाए।
इसके अलावा पुलिस को गवाहों के बयान दर्ज करने में “स्पीच-टू-टेक्स्ट AI” तकनीक के उपयोग का निर्देश भी दिया गया, ताकि मैन्युअल रिकॉर्डिंग में लगने वाला समय कम किया जा सके और जांच प्रक्रिया तेज हो।
मॉनिटरिंग सेल की बैठक में SP और कमिश्नर की मौजूदगी जरूरी
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि जिला जज की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में जिला पुलिस प्रमुख और पुलिस कमिश्नर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें। कोर्ट ने कहा कि इन बैठकों से अनुपस्थित रहना न्यायिक प्रोटोकॉल का अपमान माना जाएगा।
न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर भी विचार
हाईकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) उपलब्ध कराने की संभावना पर भी विचार करने का निर्देश दिया। अदालत का मानना है कि न्यायाधीशों को भयमुक्त वातावरण मिलना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है।
कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति मुख्यमंत्री को भी भेजने का निर्देश दिया है, ताकि प्रशासनिक स्तर पर इन सुधारों को प्राथमिकता के साथ लागू किया जा सके।
हालांकि मूल मामले में अदालत ने आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी।
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