हैबियस कॉर्पस से जमानत नहीं मिल सकती: सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, कहा– न्यायिक अधिकार का दुरुपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा हैबियस कॉर्पस के ज़रिए आरोपी को रिहा करने के आदेश को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि बार-बार जमानत खारिज होने पर हैबियस कॉर्पस का उपयोग करना कानून का गंभीर उल्लंघन है। जमानत का सही उपाय केवल उच्चतर न्यायालय में अपील है।

हैबियस कॉर्पस से जमानत नहीं मिल सकती: सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, कहा– न्यायिक अधिकार का दुरुपयोग

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: ‘हैबियस कॉर्पस के नाम पर जमानत नहीं’—MP हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस विवादास्पद आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें एक आरोपी को हैबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से रिहा करने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने इसे न्यायिक अधिकार का “पूरी तरह अवैध एवं अस्वीकार्य प्रयोग” करार दिया।

यह फैसला जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने सुनाया, जिसने मध्य प्रदेश सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की कार्यवाही की कड़ी आलोचना की।


🔹 पृष्ठभूमि: चार बार जमानत खारिज, फिर हैबियस कॉर्पस का सहारा

मामला FIR No. 157/2021 से संबंधित है, जो थाना बागसेवानिया, भोपाल में IPC की धारा 420 और 409 के तहत दर्ज हुई थी। आरोपी जिब्राखान लाल साहू को दिसंबर 2023 में गिरफ्तार किया गया था और फरवरी 2024 में चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी।

इसके बाद:

  • आरोपी ने चार जमानत याचिकाएँ हाईकोर्ट में दायर कीं
  • सभी लगातार खारिज हो गईं
  • अंतिम जमानत याचिका 29 मई 2024 को खारिज हुई
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इसके बाद आरोपी की बेटी ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की और दावा किया कि उसके पिता की हिरासत “ग़ैर-क़ानूनी” है।

हाईकोर्ट ने, राज्य की आपत्ति के बावजूद, 3 अक्टूबर 2024 को आरोपी को 5,000 रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दे दिया।


🔹 सुप्रीम कोर्ट: ‘यह तरीका हमारी अंतरात्मा को झकझोर देता है’

राज्य सरकार द्वारा आदेश को चुनौती देने पर सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई। न्यायालय ने कहा कि यह प्रकरण:

“Prima facie shocks our conscience.”
(“प्रथम दृष्टया हमारी अंतरात्मा को झकझोर देता है।”)

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगने के बाद भी आरोपी ने आत्मसमर्पण नहीं किया और अंततः 25 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पेश हुआ।


🔹 हाइकोर्ट की गंभीर त्रुटि: जमानत अस्वीकृति की समीक्षा हैबियस कॉर्पस से नहीं हो सकती

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • हैबियस कॉर्पस का उपयोग अवैध हिरासत के मामलों के लिए होता है
  • किसी आरोपी की न्यायिक हिरासत ‘अवैध’ नहीं मानी जा सकती, जब:
    • FIR दर्ज हो
    • गिरफ्तारी वैध हो
    • चार्जशीट दाखिल हो
    • अदालतें बार-बार जमानत याचिका खारिज कर चुकी हों

कोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट ने हैबियस कॉर्पस को जमानत अपील जैसा माना। यह पूरी तरह बिना अधिकार (without jurisdiction) था।”

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि ऐसा तरीका स्वीकार हो गया तो:

  • जमानत प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी
  • हैबियस कॉर्पस का दुरुपयोग बढ़ेगा
  • आरोपी बिना वैधानिक परीक्षण के रिहा होने लगेंगे

🔹 जमानत का सही उपाय क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा:

  • जमानत खारिज होने पर उपाय है — उच्च न्यायालय में अपील / विशेष अनुमति याचिका (SLP)
  • हैबियस कॉर्पस के ज़रिए जमानत हासिल करना पूरी तरह गैरकानूनी है
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🔹 फैसला: हाईकोर्ट का आदेश रद्द

अदालत ने कहा:

  • हाईकोर्ट का आदेश अवैध, अस्थिर और अधिकार क्षेत्र से परे था
  • आदेश को पूरी तरह रद्द किया जाता है
  • यदि आरोपी चाहे तो नया नियमित जमानत आवेदन कर सकता है
  • संबंधित ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से, अपने विवेक से, उसकी जमानत पर निर्णय ले

वकीलों की उपस्थिति

अपीलकर्ता (राज्य):

  • वी.वी.वी. पत्ताभी राम, डिप्टी एडवोकेट जनरल
  • मृणाल गोपाल एल्कर (AOR)
  • अमित शर्मा, अधिवक्ता

प्रतिवादी:

  • राघवेन्द्र कुमार (AOR)
  • देवव्रत सिंह, अधिवक्ता

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