चलती ट्रेन में महिला के सामने पेशाब करने के आरोपी जज की बहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। कोर्ट ने कृत्य को घिनौना बताते हुए कहा—ऐसा आचरण बर्खास्तगी के ही लायक है।
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट रिपोर्ट
नशे में जज की शर्मनाक हरकत पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश: महिला के सामने पेशाब करने वाले जज की बहाली पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने नशे में धुत होकर चलती ट्रेन में महिला सह-यात्री के सामने पेशाब करने और अभद्र व्यवहार के आरोपी सिविल जज नवनीत सिंह यादव की बहाली पर तत्काल रोक लगा दी है।
शीर्ष अदालत ने इस कृत्य को “शर्मनाक, घिनौना और पूरी तरह अस्वीकार्य” करार देते हुए साफ कहा कि ऐसा आचरण न्यायिक सेवा में बने रहने के योग्य नहीं है और बर्खास्तगी से कम कोई सजा पर्याप्त नहीं हो सकती।
यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की, जिसने मई 2025 में दिए गए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर कड़ी नाराजगी जताई, जिसमें जज नवनीत यादव को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला 16 जून 2018 का है।
इंदौर–जबलपुर ओवरनाइट एक्सप्रेस में यात्रा के दौरान, डिंडोरी जिले के शाहपुर में पदस्थ तत्कालीन सिविल जज नवनीत यादव पर आरोप है कि—
- वे शराब के नशे में धुत थे
- एक महिला यात्री की बर्थ के पास पैंट की जिप खोलकर पेशाब करने लगे
- महिला के विरोध और चीखने पर उन्होंने खुद को सबके सामने एक्सपोज किया
- अपना ज्यूडिशियल आईडी कार्ड दिखाकर धौंस जमाई
- सह-यात्रियों और रेलवे स्टाफ से गाली-गलौज की
- बार-बार इमरजेंसी चेन खींचकर ट्रेन रोकने की कोशिश की
इस घटना ने न केवल यात्रियों को दहला दिया, बल्कि न्यायिक गरिमा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
- एक न्यायिक अधिकारी से सामान्य नागरिक से भी उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षा होती है
- महिला के सामने अश्लील कृत्य करना ज्यूडिशियल लाइफ वैल्यूज का खुला उल्लंघन है
- ऐसा आचरण न्यायपालिका की साख और विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचाता है
पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि
“यह कृत्य इतना शॉकिंग और घिनौना है कि इसमें बर्खास्तगी से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल
इस मामले में घटनाक्रम ने तब नया मोड़ लिया जब—
- 2019 में एमपी हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने जांच के बाद जज नवनीत यादव को बर्खास्त कर दिया
- लेकिन मई 2025 में, उसी हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने
- मेडिकल रिपोर्ट में नशे की पुष्टि न होने
- और गवाहों के पलट जाने
के आधार पर जज को बहाल कर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि
“यह मानने से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी जज ने अपने पद के प्रभाव का इस्तेमाल कर गवाहों को प्रभावित या डराया हो।”
‘यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं’
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला—
- केवल एक व्यक्ति की निजी बदसलूकी का नहीं
- बल्कि न्यायिक अनुशासन और संस्थागत नैतिकता का है
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी अपने पद का सहारा लेकर अश्लीलता और बदसलूकी को जायज़ ठहराने की कोशिश करता है, तो यह न्यायपालिका के लिए खतरनाक मिसाल बन सकती है।
पीठ ने यह भी जोड़ा कि—
“कानून की नजर में जज और आम नागरिक के लिए मानक अलग नहीं हो सकते। अश्लीलता और दुर्व्यवहार की सजा सबके लिए समान होनी चाहिए।”
क्यों है यह फैसला अहम?
- यह फैसला न्यायिक जवाबदेही पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख दर्शाता है
- न्यायिक अधिकारियों को यह स्पष्ट संदेश देता है कि
पद, रुतबा और कुर्सी कानून से ऊपर नहीं हैं - महिलाओं की गरिमा और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के सवाल पर यह एक मजबूत न्यायिक हस्तक्षेप है
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