नेपाल को मिले नए मुख्य न्यायाधीश, वरिष्ठता पर योग्यता को तरजीह

Like to Share

संवैधानिक परिषद ने परंपरा तोड़ते हुए चौथे वरिष्ठ न्यायाधीश को चुना

नेपाल में जस्टिस मनोज कुमार शर्मा ने 33वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उनकी नियुक्ति ने वरिष्ठता बनाम योग्यता की बहस को तेज कर दिया, क्योंकि संवैधानिक परिषद ने परंपरा तोड़ते हुए चौथे वरिष्ठ न्यायाधीश को चुना।


जस्टिस मनोज कुमार शर्मा बने नेपाल के 33वें मुख्य न्यायाधीश, नियुक्ति पर छिड़ी बहस

शपथ के साथ संभाला मुख्य न्यायाधीश का पद

नेपाल के नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस मनोज कुमार शर्मा ने औपचारिक रूप से पदभार संभाल लिया है। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल द्वारा नियुक्ति के बाद उन्होंने मंगलवार को शपथ ग्रहण की और बुधवार से सुप्रीम कोर्ट में अपनी जिम्मेदारियां निभाना शुरू कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश के रूप में वह अब बेंच आवंटन, मामलों की सूची तय करने और अदालत के प्रशासनिक कार्यों की निगरानी करेंगे।

उनकी नियुक्ति के साथ ही वह नेपाल के 33वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 129(4) के तहत उनका कार्यकाल छह वर्षों का होगा।


वरिष्ठता की परंपरा टूटने से बढ़ा विवाद

जस्टिस शर्मा की नियुक्ति पिछले कुछ सप्ताहों से राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि संवैधानिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट की पारंपरिक वरिष्ठता प्रणाली से हटकर उन्हें मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की।

शर्मा वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर थे। इसके बावजूद परिषद ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों—कुमार रेग्मी तथा हरि प्रसाद फुयाल—को दरकिनार करते हुए उनके नाम को मंजूरी दी।

इस फैसले ने न्यायपालिका में वरिष्ठता बनाम योग्यता की बहस को फिर से तेज कर दिया

Must Read -  सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में 3 वकीलों, 3 न्यायिक अधिकारियों के नियुक्ति की अनुशंसा की-

संवैधानिक परिषद में भी हुआ विरोध

जस्टिस शर्मा के नाम पर संवैधानिक परिषद के भीतर भी मतभेद सामने आए। राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष नारायण दहल और विपक्षी प्रतिनिधि भीष्मराज आंगदेम्बे ने इस फैसले पर असहमति जताई।

उन्होंने कहा कि नेपाल की न्यायपालिका लंबे समय से वरिष्ठता को मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति का आधार मानती रही है और बिना ठोस संस्थागत कारणों के इस परंपरा से हटना उचित नहीं माना जा सकता।

आलोचकों का तर्क था कि इस प्रकार की नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।


समर्थकों ने योग्यता और अनुभव को बताया प्राथमिकता

हालांकि, फैसले के समर्थकों ने कहा कि केवल वरिष्ठता ही मुख्य न्यायाधीश चयन का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। उनके अनुसार, योग्यता, न्यायिक दक्षता और पेशेवर अनुभव को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

समर्थकों का मानना है कि न्यायपालिका के शीर्ष पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए जो प्रशासनिक क्षमता और न्यायिक नेतृत्व दोनों में सक्षम हो।


नेपाल बार एसोसिएशन ने भी जताई चिंता

इस नियुक्ति ने कानूनी विशेषज्ञों और नेपाल बार एसोसिएशन का भी ध्यान खींचा। कुछ विधि विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि वरिष्ठ न्यायाधीशों को स्पष्ट कारण बताए बिना नजरअंदाज करना न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।

हालांकि, संसदीय सुनवाई समिति ने जस्टिस शर्मा के नाम को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी, जिसके बाद राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की।


कानून और न्यायपालिका में लंबा अनुभव

जस्टिस मनोज कुमार शर्मा का जन्म 18 जून 1970 को नेपाल के पर्सा जिले के बीरगंज में हुआ था। उनका संबंध नेपाल के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दामोदर शर्मा के परिवार से भी बताया जाता है।

Must Read -  अदालत ने Defamation Case में दिल्ली CM अरविंद केजरीवाल और आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह को 26 जुलाई को कोर्ट के समक्ष पेश होने का निर्देश

उन्होंने काठमांडू स्थित नेपाल लॉ कैंपस से कानून की पढ़ाई की। इसके बाद भारत के पुणे विश्वविद्यालय से एलएलएम तथा त्रिभुवन विश्वविद्यालय से श्रम कानून में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।

1990 के दशक में उन्होंने वकालत शुरू की और निजी लॉ फर्मों तथा कानूनी परामर्श क्षेत्रों में कार्य किया। बाद में वह न्यायपालिका से जुड़े और अपीलीय अदालत के न्यायाधीश बने।

18 अप्रैल 2019 को उन्हें नेपाल सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। फरवरी 2024 से वह सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में भी कार्यरत थे।


नेपाल की न्यायिक व्यवस्था में अहम मोड़

विशेषज्ञों के अनुसार, जस्टिस शर्मा की नियुक्ति नेपाल की न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है। यह पहली बार नहीं है जब वरिष्ठता पर बहस हुई हो, लेकिन इस नियुक्ति ने न्यायपालिका में पारंपरिक प्रणाली और योग्यता-आधारित चयन के बीच संतुलन पर गंभीर चर्चा शुरू कर दी है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके नेतृत्व में नेपाल का सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक सुधार, पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता के मुद्दों पर किस दिशा में आगे बढ़ता है।


Tags

#NepalSupremeCourt #ChiefJustice #ManojKumarSharma #NepalJudiciary #JudicialAppointments #SeniorityVsMerit #ConstitutionalCouncil #NepalLegalNews #JudicialReforms #SouthAsia #SupremeCourt #LegalNews #HindiLegalNews #NepalPolitics #JusticeSharma

Leave a Comment