853 मामलों के विश्लेषण देने में देरी पर इलाहाबाद HC की खिंचाई करते हुए, SC ने कहा – छुट्टियों में काम करें या केस हमें भेज दें-

सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा 9 मई को कहा गया था कि पहली बार अपराध करने के ऐसे सभी आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए, जो 10 वर्ष कैद में गुजार चुके हैं। परन्तु इसके 2 माह बाद भी कोर्ट को बताया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 62 जमानत अर्जियां अभी लंबित हैं। 2 माह में 232 नई बेल एप्लिकेशन दाखिल हो चुकी हैं। उत्तर प्रदेश गवर्नमेंट ने बताया कि 853 मामलों पर अभी विश्लेषण किया जाना शेष है।

विचाराधीन कैदियों को जमानत पर छोड़ने के मामले में ढिलाई बरते जाने पर उच्चतम न्यायलय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर फटकार लगाई।

जमानत अर्जियों की सुनवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट Supreme Court ने कहा कि उसके स्पष्ट आदेश के बावजूद 10 साल से जेलों में रहकर अपने मुकदमों की सुनवाई का इंतजार कर रहे लोगों को रिहा नहीं किया गया है।

शीर्ष अदालत ने कहा की अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट को इन मामलों को संभालना मुश्किल लग रहा है तो बताएं, हम इनका अतिरिक्त बोझ उठाने के लिए भी तैयार हैं। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से कहा कि उसे कुछ हटकर सोचना चाहिए और इन मामलों के जल्दी निपटारे के लिए छुट्टियों में भी काम करना चाहिए।

न्यायमूर्ति एसके कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की बेंच ने गौर किया कि उत्तर प्रदेश की जेलों में बड़ी तादाद में ऐसे आरोपी कैद हैं, जो बरसों से अपनी अपीलों पर सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई को कहा था कि पहली बार अपराध करने के ऐसे सभी आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए, जो 10 साल जेल में गुजार चुके हैं।

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सर्वोच्च अदालत ने कहा की हाईकोर्ट से ऐसे मामलों को इकट्ठा करके एकसाथ निपटारा करने का आदेश दिया था।

इस आदेश को 2 महीने गुजरने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभी 62 जमानत अर्जियां लंबित हैं और 2 महीने में 232 नई बेल एप्लिकेशन दाखिल हो चुकी हैं। यूपी सरकार की तरफ से बताया गया कि 853 ऐसे मामले हैं, जिनमें पहली बार के आरोपी 10 साल से ज्यादा समय से जेल में हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सीनियर एडवोकेट गरिमा प्रसाद ने कहा कि इन मामलों पर सरकार अभी विश्लेषण कर रही है।

शीर्ष अदालत ने कड़ा रवैया अपनाते हुए कहा कि गाइडलाइंस बना दिए जाने के बावजूद हाईकोर्ट जमानत याचिकाओं पर जल्दी सुनवाई नहीं कर रहा है।

इतनी बड़ी संख्या में बंदियों के साथ और इलाहाबाद और लखनऊ में हाई कोर्ट द्वारा उनकी अपील या जमानत आवेदन पर कोई निर्णय नहीं होने के कारण, शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों ने कहा, “मानदंड निर्धारित करने के बाद, इन आवेदनों को निपटाने में सप्ताह नहीं लगना चाहिए।

पीठ ने हाईकोर्ट से कहा कि यदि आपको इन्हें संभालना कठिन लग रहा है तो हम इस बोझ को उठा लेंगे. जमानत याचिकाओं को हमें भेज दीजिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपको शनिवार या रविवार को कोर्ट में बैठने जैसा कुछ अलग हटकर सोचना होगा। आप लोगों को हमेशा के लिए जेल में नही रख सकते। ऐसा करके हम लोगों की स्वतंत्रता के साथ समझौता कर रहे हैं। हम यह आपको कई बार कह चुके हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया कि वह दो हफ्ते के अंदर 853 मामलों की सूची उनके सीरियल नंबरों के साथ उसके सामने पेश करे। इसमें कैदी की हिरासत में बिताई गई अवधि के साथ ये भी बताया जाए कि इन मामलों में से कितनों की जमानत का सरकार ने विरोध किया और किस आधार पर।

शीर्ष अदालत ने 15 साल से अधिक और 10 से 14 साल तक जेल में रह चुके कैदियों पर हाईकोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार द्वारा दाखिल रिपोर्ट पर गौर किया। बेंच ने कहा कि ऐसा लगता है कि 62 जमानत याचिकाओं का निपटारा अभी बाकी है और अगले दो-तीन हफ्ते में ये सूचीबद्ध हो सकती हैं।

शीर्ष अदालत ने इस कार्य के लिए राज्य को दो सप्ताह का समय दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई अब 17 अगस्त को होगी।

केस टाइटल – SULEMAN VERSUSTHE STATE OF UTTAR PRADESH
केस नंबर – Miscellaneous Application No. 764/2022 in Crl.A. No. 491/2022