हाई कोर्ट ने माना: रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद सरकारी बंगला न खाली करने वाले जजों के खिलाफ कोई नियम नहीं

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दिल्ली हाई कोर्ट ने आरटीआई के जवाब में खुलासा किया कि रिटायरमेंट, ट्रांसफर या प्रमोशन के बाद भी सरकारी बंगला अपने पास रखने वाले जजों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई नियम नहीं हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

दिल्ली हाई कोर्ट ने माना: रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद सरकारी बंगला न खाली करने वाले जजों के खिलाफ कोई नियम नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट का खुलासा: जजों के सरकारी बंगले पर कोई कार्रवाई नियम नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम खुलासा करते हुए कहा है कि रिटायरमेंट, ट्रांसफर या प्रमोशन के बाद भी सरकारी आवास (बंगला) अपने पास रखने वाले जजों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई स्पष्ट नियम मौजूद नहीं हैं। यह जानकारी सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत दाखिल एक आवेदन के जवाब में सामने आई है।

यह आरटीआई आवेदन जाने-माने पारदर्शिता कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल द्वारा दाखिल किया गया था। उन्होंने अगस्त 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट से यह जानकारी मांगी थी कि सेवानिवृत्ति या स्थानांतरण के बाद जज कितने समय तक सरकारी बंगले में रह सकते हैं और इस अवधि के समाप्त होने के बाद यदि वे बंगला खाली नहीं करते, तो उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।


रिटेंशन की सीमा तय, लेकिन कार्रवाई के नियम नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट की आरटीआई सेल ने अपने जवाब में बताया कि

“रिटायरमेंट के मामले में 30 दिन तक और ट्रांसफर/प्रमोशन के मामलों में 90 दिन तक सरकारी आवास अपने पास रखना अनुमेय (permissible) है, और लागू दिशानिर्देशों के अनुसार यह अवधि बढ़ाई भी जा सकती है।”

हालांकि, कोर्ट ने यह बताने से इनकार कर दिया कि “लागू दिशानिर्देश” क्या हैं और इन्हें किस प्रक्रिया से बढ़ाया जा सकता है।

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अग्रवाल ने यह भी पूछा था कि अगर कोई जज इस निर्धारित रियायती अवधि (grace period) के बाद भी बंगला खाली नहीं करता तो उसके खिलाफ कौन-सी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है। इस सवाल पर हाई कोर्ट का जवाब केवल एक पंक्ति का था:

“ऐसे कोई नियम मौजूद नहीं हैं।”


आरटीआई अधिनियम की धारा 8 के तहत जानकारी देने से इंकार

हाई कोर्ट की आरटीआई सेल ने यह भी कहा कि मांगी गई जानकारी का खुलासा आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(b) और 8(1)(g) के तहत नहीं किया जा सकता। इन धाराओं के तहत ऐसी सूचनाओं का खुलासा रोका जा सकता है जो न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित हों या जिससे किसी व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

इसके अलावा, कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी फाइल नोटिंग्स (file notings) साझा करने से भी इनकार कर दिया।


सुभाष अग्रवाल ने दायर की अपील

आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने इस जवाब के खिलाफ प्रथम अपील दायर की है। उन्होंने कहा कि कोर्ट द्वारा धारा 8(1)(b) का उपयोग करना अनुचित है क्योंकि यह मामला किसी न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित नहीं बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा है।

उन्होंने कहा,

“मैंने अपनी अपील में यह तर्क दिया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी सूचना को सार्वजनिक करने से होने वाला सार्वजनिक हित नुकसान की संभावना से अधिक है, तो ऐसी जानकारी का खुलासा किया जा सकता है।”


पारदर्शिता पर उठे सवाल

इस खुलासे ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर, सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को सेवानिवृत्ति या स्थानांतरण के बाद निश्चित अवधि में सरकारी आवास खाली करना अनिवार्य होता है। लेकिन जजों के लिए इस संबंध में कोई कार्रवाई नियम न होना एक प्रशासनिक शून्य (administrative vacuum) की ओर इशारा करता है।

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कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशानिर्देश और जवाबदेही तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए ताकि “समान नियम, समान जवाबदेही” का सिद्धांत न्यायपालिका पर भी समान रूप से लागू हो सके।


निष्कर्ष:
दिल्ली हाई कोर्ट के इस खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद भी सरकारी बंगले पर कब्जा बनाए रखने वाले जजों के खिलाफ कोई कार्रवाई नियम नहीं हैं। यह मामला अब सार्वजनिक हित और न्यायिक पारदर्शिता दोनों के बीच संतुलन की एक नई बहस को जन्म दे रहा है।

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