FGM पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, महिलाओं के खतना पर लग सकती है रोक

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FGM पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘स्वास्थ्य के आधार पर भी लग सकती है रोक’

सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय की FGM प्रथा पर सुनवाई के दौरान जजों ने चिंता जताई। कोर्ट ने कहा—धार्मिक स्वतंत्रता स्वास्थ्य और गरिमा से ऊपर नहीं।


सुप्रीम कोर्ट में FGM पर तीखी बहस

Supreme Court of India की 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। अदालत ने इस प्रथा पर गंभीर चिंता जताते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन के सवाल उठाए।


सबरीमाला मामले के साथ होगी सुनवाई

FGM को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अब Indian Young Lawyers Association v. State of Kerala यानी सबरीमाला मामले के साथ सुना जाएगा। इसका कारण यह है कि दोनों मामलों में Articles 25 and 26 of the Constitution of India के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और “Essential Religious Practice” सिद्धांत पर विचार किया जा रहा है।


याचिकाकर्ताओं का तर्क: गरिमा और स्वास्थ्य का उल्लंघन

FGM का विरोध करने वाले पक्ष ने अदालत से कहा कि यह प्रथा महिलाओं और बच्चियों के गरिमा के साथ जीने के अधिकार, शारीरिक स्वायत्तता और स्वास्थ्य अधिकार का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह प्रथा सात वर्ष तक की बच्चियों पर की जाती है और इसके गंभीर शारीरिक तथा मानसिक दुष्परिणाम होते हैं।


सिद्धार्थ लूथरा की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Siddharth Luthra ने अदालत को बताया कि FGM के कारण बच्चियों के शरीर में स्थायी बदलाव हो जाते हैं, जिनका प्रभाव उनके यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई परिवार सामाजिक बहिष्कार के डर से इस प्रथा का पालन करते हैं।

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‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं’

लूथरा ने दलील दी कि FGM को किसी भी स्थिति में “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice) नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे Article 26 of the Constitution of India के तहत धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।


जस्टिस बागची की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरानन्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की टिप्पणी ने बहस को नया मोड़ दिया। उन्होंने कहा कि संभव है इस मुद्दे को सुलझाने के लिए जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े, क्योंकि Article 25 of the Constitution of India स्वयं कहता है कि धार्मिक स्वतंत्रता स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।


‘स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंध संभव’

जस्टिस बागची ने संकेत दिया कि यदि कोई धार्मिक प्रथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है, तो उस पर संवैधानिक रूप से रोक लगाई जा सकती है। यह टिप्पणी FGM के खिलाफ चल रही कानूनी चुनौती में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


धार्मिक स्वतंत्रता बनाम महिलाओं के अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता महिलाओं की शारीरिक गरिमा, स्वास्थ्य और यौन स्वायत्तता से ऊपर हो सकती है। अदालत को यह तय करना होगा कि किसी धार्मिक समुदाय की परंपरा किस सीमा तक संवैधानिक संरक्षण पा सकती है।


संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा

यह मामला केवल धार्मिक अधिकारों का नहीं बल्कि महिलाओं के मौलिक अधिकारों, बच्चों की सुरक्षा और मानव गरिमा से भी जुड़ा हुआ है। संविधान पीठ का अंतिम फैसला भविष्य में धार्मिक प्रथाओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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निष्कर्ष

FGM पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा क्या है। अदालत के संकेत बताते हैं कि स्वास्थ्य और गरिमा जैसे अधिकारों को सर्वोच्च महत्व दिया जा सकता है।


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