सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2023 का फैसला केवल कानूनी शून्य भरने के लिए था। चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून में CJI को शामिल करना संसद के लिए अनिवार्य नहीं।
🔴 चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके पूर्व फैसले का उद्देश्य केवल “कानूनी शून्य” (vacuum) को भरना था, जब तक संसद इस विषय पर कानून न बना दे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उस फैसले में संसद को किसी विशेष ढांचे या संरचना के तहत कानून बनाने का निर्देश नहीं दिया गया था।
⚖️ CJI को शामिल करना अनिवार्य नहीं: कोर्ट
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2 मार्च 2023 के फैसले को इस रूप में नहीं पढ़ा जा सकता कि संसद को चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को अनिवार्य रूप से शामिल करना ही होगा।
पीठ ने कहा कि संसद अपने विवेक से कानून बना सकती है।
📜 2023 के कानून को चुनौती
सुप्रीम Court फिलहाल उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की वैधता को चुनौती दी गई है।
इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति से CJI को बाहर कर दिया गया है।
🧾 याचिकाकर्ताओं की क्या दलील?
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया, जो कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से पेश हुए, ने दलील दी कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि जैसे न्यायाधीशों की नियुक्ति में संतुलित प्रक्रिया अपनाई जाती है, वैसे ही सिद्धांत चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर भी लागू होने चाहिए।
⚠️ “निर्वाचित सरकारों की तानाशाही” टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लगातार सरकारों द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर कानून न बनाने को “निर्वाचितों की तानाशाही” (tyranny of the elected) बताया।
अदालत ने कहा कि लंबे समय तक कानून न बनाना एक गंभीर मुद्दा था।
🏛️ ADR ने उठाए निष्पक्ष चुनाव के सवाल
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कानून की अनुपस्थिति का फायदा हर सरकार ने उठाया और नियुक्तियों को अपने पक्ष में प्रभावित किया।
याचिकाओं में कहा गया है कि मौजूदा कानून स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांत के खिलाफ है।
📊 चयन समिति की मौजूदा संरचना
वर्तमान कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में शामिल हैं:
- प्रधानमंत्री
- लोकसभा में विपक्ष के नेता
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस संरचना में सरकार का प्रभाव अधिक है और CJI को हटाने से संतुलन कमजोर हुआ है।
📌 2023 के फैसले का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च 2023 को अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, CJI और विपक्ष के नेता वाली समिति की सिफारिश पर की जाएगी।
बाद में संसद ने नया कानून पारित कर CJI को समिति से हटा दिया।
🚨 कानून की धाराओं को चुनौती
याचिकाओं में विशेष रूप से कानून की धारा 7 और 8 को चुनौती दी गई है, जो नियुक्ति प्रक्रिया तय करती हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री और उनके नामित मंत्री के कारण चयन प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव निर्णायक हो जाता है।
📅 अगली सुनवाई 14 मई को
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई 14 मई के लिए निर्धारित की है।
यह मामला चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता से जुड़े बड़े संवैधानिक प्रश्नों को लेकर अहम माना जा रहा है।
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